#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तनवतितमोऽध्यायः
राजा प्रतीप का गंगा को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करना और शान्तनु का जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगा से मिलना...(दिन 300)
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रूयुवाच
एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते ।
त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ।। १२ ।।
स्त्री बोली-धर्मज्ञ नरेश! आप जैसा कहते हैं, वैसा भी हो सकता है। मैं आपके पुत्रके साथ संयुक्त होऊँगी। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, उसके कारण मैं विख्यात भरतवंशका सेवन करूँगी ।। १२ ।।
पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् ।
गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि ।। १३ ।।
पृथ्वीपर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं। सौ वर्षोंमें भी आपलोगोंके गुणोंका वर्णन मैं नहीं कर सकती ।। १३ ।।
कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् ।
समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो ।। १४ ।।
तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित्।
एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ।। १५ ।।
पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्ग प्राप्स्यति ते सुतः ।
आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ ! मैं एक शर्तके साथ आपके पुत्रसे विवाह करूँगी। प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्रको स्वीकार होना चाहिये। वे उसके विषयमें कभी कुछ विचार न करें। इस शर्तपर रहती हुई मैं आपके पुत्रके प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी। मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रिय पुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्रको स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।। १४-१५३ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथेत्युक्ता तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ।। १६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! राजा प्रतीपने 'तथास्तु' कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वह वहीं अन्तर्धान हो गयी ।। १६ ।।
पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत्।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ।। १७ ।।
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन ।
इसके बाद पुत्रके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीपने उसकी बात याद रखी। कुरुनन्दन ! इन्हीं दिनों क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नीको साथ लेकर पुत्रके लिये तपस्या करने लगे ।। १७ ।।
(प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत।
श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी ।।
ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम् ।
कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा ।।)
तयोः समभवत् पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषः ।। १८ ।।
प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद्-ऋतुके शुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। तदनन्तर दसवाँ मास प्राप्त होनेपर प्रतीपकी महारानीने एक देवोपम पुत्रको जन्म दिया, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था। उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ पूर्वोक्त राजा महाभिष ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ।। १८ ।।
शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनुः ।
शान्त पिताकी संतान होने से वे शान्तनु कहलाये।
(तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत् प्रभुः ।
जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ।।
शक्तिशाली राजा प्रतीपने उस बालकके आवश्यक कृत्य (संस्कार) करवाये। ब्राह्मण पुरोहितने वेदोक्त क्रियाओंद्वारा उसके जात-कर्म आदि सम्पन्न किये।
नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ।
शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ।।
जनमेजय ! तदनन्तर बहुत-से ब्राह्मणोंने मिलकर वेदोक्त विधियोंके अनुसार शान्तनु का नामकरण-संस्कार भी किया।
ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकपालकः।
स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मविदां वरः ।।
धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः ।
यौवनं चापि सम्प्राप्तः कुमारो वदतां वरः ।।)
तत्पश्चात् बड़े होनेपर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षाका कार्य करने लगे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने धनुर्वेदमें उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनमें भी ऊँची स्थिति प्राप्त की। वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ वे राजकुमार धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँच गये।
संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान् विजातान् स्वेन कर्मणा ।। १९ ।।
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।
प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ।। २० ।।
अपने सत्कमाँद्वारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकोंका स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानमें ही लगे रहते थे। युवावस्थामें पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनुको राजा प्रतीपने आदेश दिया- ।। १९-२० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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