Govind Hashani
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28 days ago
सिंधी समाज में विवाह में देरी एक गंभीर चेतावनी और सामूहिक समाधान की अपील आज सिंधी समाज के भीतर सबसे बड़ी और चिंताजनक समस्या बच्चों के विवाह में हो रही अत्यधिक देरी बन चुकी है। यह समस्या केवल लड़की पक्ष की नहीं है और न ही केवल लड़के पक्ष की—यह पूरे समाज की सोच, अपेक्षाओं और उदासीनता का परिणाम है। दुखद स्थिति यह है कि लड़की वाले मानते हैं कि गलती लड़के वालों की है,और लड़के वाले समझते हैं कि दोष लड़की वालों में है। इस बीच न तो कोई संस्था, न कोई रिश्तेदार, और न ही समाज का कोई प्रभावशाली वर्ग इस विषय पर खुलकर चर्चा करने या समाधान खोजने का साहस कर रहा है। लड़की पक्ष की अपेक्षाएँ लड़की वालों का कहना है कि उपयुक्त लड़का नहीं मिल पाने के कारण विवाह में देरी हो रही है। आज की लड़कियाँ कम से कम पोस्ट-ग्रेजुएट हो रही हैं। कुछ प्रतिशत लड़कियाँ अब बिज़नेस की जगह नौकरी-पेशा लड़का मांग रही है जबकि सिंधी समाज में अधिकतर बिजनेसमैन है परंतु अपेक्षाएँ यहीं नहीं रुकतीं— लड़का पोस्ट-ग्रेजुएट हो, अत्यधिक समझदार हो, कम से कम 6 फीट लंबा हो, इकलौता हो या अधिकतम एक बहन हो, करोड़पति हो, बड़ा घर, कॉलोनी भी उन्हीं की पसंद की हो बड़ी गाड़ी, नौकर-चाकर, स्विमिंग पूल और शादी के बाद विदेश हनीमून— यह सूची लगातार बढ़ती जा रही है। ये सब लड़की वालो का अधिकार भी है पर तू अति हर चीज की गलत होती है लड़का पक्ष की अपेक्षाएँ भी कम नहीं लड़के वाले भी “अति-उत्तम” की तलाश में लड़कियों को लगातार रिजेक्ट कर रहे हैं। सबसे पहले लड़की की हाइट देखी जाती है, फिर हेल्थ— न ज़्यादा मोटी, न ज़्यादा दुबली, लड़के के बराबर या उससे कम हाइट— जो व्यवहारिक रूप से अत्यंत कठिन है। इसके साथ यह भी अपेक्षा की जाती है कि लड़की के पिता जीवित हों, भाई अवश्य हो, ताकि भविष्य में ससुराल की ज़िम्मेदारी लड़के पर न आए। कुंडली — विवाह का सबसे बड़ा अवरोध जब दोनों पक्ष किसी तरह थोड़ा आगे बढ़ते हैं, तो बीच में कुंडली मिलान आ खड़ा होता है। अनेक रिश्ते केवल कुंडली के कारण बिना किसी वास्तविक मानवीय कारण के यहीं समाप्त हो जाते हैं। आज विवाह में देरी का यह सबसे बड़ा और मौन संकट बन चुका है। पहले और आज का सामाजिक अंतर पहले समाज में अपनापन था। रिश्तेदार आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेते थे। मौसी, बुआ, चाचा, फूफा बीच में खड़े होकर रिश्ते जोड़ देते थे। आज स्थिति यह है कि हर कोई अपने हाथ झटक चुका है। कोई बीच में आना नहीं चाहता, क्योंकि डर है— “अगर शादी के बाद कुछ ऊँच-नीच हो गई तो ज़िम्मेदारी किसकी?” इसी सोच ने समाज में एक गहरी खाई पैदा कर दी है। यदि यही स्थिति बनी रही तो… यदि विवाह में देरी इसी प्रकार चलती रही, तो इसके दुष्परिणाम केवल सामाजिक नहीं, बल्कि नैतिक, मानसिक और सुरक्षा से जुड़े भी हो सकते हैं। एक निश्चित आयु के बाद कुछ लड़कियाँ भावनात्मक असंतुलन और अकेलेपन के कारण गलत संगत में फँस सकती हैं। ऐसी परिस्थितियाँ कई बार शोषण, ब्लैकमेल और लंबे समय तक मानसिक व आर्थिक उत्पीड़न का कारण बन जाती हैं। समाज ने ऐसे दर्दनाक उदाहरण पहले भी देखे हैं। इसी प्रकार, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद कुछ लड़कियाँ पूरी तरह बेलगाम भी हो सकती हैं, जहाँ माता-पिता का नैतिक प्रभाव कम हो जाता है और गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। इसकी संभावना को प्रतिशत में नहीं आँका जा सकता, पर इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, लड़कों के विवाह में देरी से गलत आदतें और अनुचित प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। गलत स्थानों पर जाना, अनुचित संबंध बनाना, और विवाह से पहले ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना आज एक सामान्य चलन बनता जा रहा है, जो समाज के मूल संस्कारों के लिए अत्यंत घातक है। विवाह का अत्यधिक खर्च — एक मौन कारण विवाह में देरी का एक बहुत बड़ा कारण अत्यधिक खर्च और दिखावा भी है। जिनके पास पर्याप्त रुपए नहीं है वे चाहते हे लड़की खुद ही लड़का ढूंढ कर खुद ही शादी करे हमारी जो श्रद्धा भक्ति होगी वहीं हम देंगे इसी शर्तों की वजह से भी कई परिवार एक दूसरे से मिल नहीं पा रहे है विवाह अब संस्कार नहीं, बल्कि प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा बन चुका है। बड़े होटल, महंगे आयोजन, और सामाजिक दबाव साधारण परिवारों को विवाह से डराने लगे हैं। अमीर वर्ग को आगे आकर विवाह को अत्यंत साधारण बनाने का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, ताकि कम खर्च में शादी करने वाला न स्वयं को छोटा समझे और न ही समाज उसे हीन दृष्टि से देखे। समाधान — केवल भाषण नहीं, निर्णय कुंडली मिलान पर पूर्ण प्रतिबंध पर समाज में गंभीर चर्चा आवश्यक है। पंडित वर्ग को भी आगे आना होगा और समाज को वास्तविक मार्गदर्शन देना होगा। रिश्तेदारों से अपील है कि जिम्मेदारी से पीछे न हटें। विवाह की आयु पर स्पष्ट नीति बने — लड़की 21 वर्ष, लड़का 22 वर्ष — इस पर समाज को मंथन करना होगा। सिंधी परिवारों के बायो डेटा में अक्सर पाकिस्तान के अलग अलग जिलों के नाम भी लिखना बंद करना होगा क्योंकि हम सब सिंधी एक है। अंतिम चेतावनी और अपील विवाह कोई सौदा नहीं, कोई प्रतियोगिता नहीं, और न ही दिखावे का मंच है। यदि आज समाज ने अपेक्षाओं, कुंडली, डर और दिखावे को नहीं छोड़ा, तो आने वाले वर्षों में अविवाहित युवाओं की संख्या, मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन एक भयानक रूप ले सकता है। अब भी समय है— सोच बदलने का, ज़िम्मेदारी लेने का और समाज को सही दिशा देने का। समाज बचेगा, तो परिवार बचेंगे। परिवार बचेंगे, तो आने वाली पीढ़ी सुरक्षित रहेगी। आए हम अब मिलकर समाज के उत्थान हेतु आगे आए और कम से कम हर व्यक्ति ठान ले कि में एक विवाह में कम से कम पर रूप से जोड़ी मिलान में मदद करूंगा जिसमें न रुपए लगने है और बदले मिलेंगी ढेर सारी दुआएं इसे उत्कृष्ट कार्य समाज के लिए अनुकूल भी होंगे सभी वर्गों को आगे आना होगा जय झूले लाल अखंड सिंधी समाज #sindhi #sindhi satetas #sindhi state #sindhi Jai Jhulelal #सिन्धी