जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा ९☀️ पृष्ठ १०☀️
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा ।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥१॥
हनुमान् जी वृक्ष के पत्तों में छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियों को साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया।
बहुबिधि खल सीतहि समुझावा।साम दान भयभेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।मंदोदरी आदि सबरानी॥२॥
उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया । साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावण ने कहा- हे सुमुखि ! हे सयानी ! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियों को ॥२॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही ।
सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥३॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही ! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण कर के जानकीजी तिनके की आड़ (परदा) कर के कहने लगीं ॥३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा ।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझ कहति जानकी ।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥४॥
हे दशमुख ! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं-तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीर के बाणकी खबर नहीं है ॥४॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम ! निर्लज्ज ! तुझे लज्जा नहीं आती ॥५॥
दो०- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥९॥
अपने को जुगनू के समान और रामचन्द्रजी को सूर्य के समान सुन कर और सीताजी के कठोर वचनों को सुन कर रावण तलवार निकाल कर बड़े गुस्से में आ कर बोला ॥९॥
#सीताराम भजन