#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 308)
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अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत् प्रियदर्शनः ।
तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद् वायुवेगसमो जवे। अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ।। १४ ।।
उनमें न राग था न द्वेष। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्यारा लगता था। वे तेजमें सूर्य और वेगमें वायुके समान जान पड़ते थे; क्रोधमें यमराज और क्षमामें पृथ्वीकी समानता करते थे ।। १४ ।।
वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् । शान्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत तथा नृप ।। १५ ।।
जनमेजय ! महाराज शान्तनुके इस पृथ्वीका पालन करते समय पशुओं, वराहों, मृगों तथा पक्षियोंका वध नहीं होता था ।। १५ ।।
ब्रह्मधर्मोत्तरे राज्ये शान्तनुर्विनयात्मवान् । समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः ।। १६ ।।
उनके राज्यमें ब्रह्म और धर्मकी प्रधानता थी। महाराज शान्तनु बड़े विनयशील तथा काम-राग आदि दोषोंसे दूर रहनेवाले थे। वे सब प्राणियोंका समानभावसे शासन करते थे ।। १६ ।।
देवर्षिपितृयज्ञार्थमारभ्यन्त तदा क्रियाः ।
न चाधर्मेण केषांचित् प्राणिनामभवद् वधः ।। १७ ।।
उन दिनों देवयज्ञ, ऋषियज्ञ तथा पितृयज्ञके लिये कर्मोंका आरम्भ होता था। अधर्मका भय होनेके कारण किसी भी प्राणीका वध नहीं किया जाता था ।। १७ ।।
असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम् । स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत् पिता ।। १८ ।।
दुःखी, अनाथ एवं पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए जीव-इन सब प्राणियोंका वे राजा शान्तनु ही पिता के समान पालन करते थे ।। १८ ।।
तस्मिन् कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति ।
श्रिता वागभवत् सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ।। १९ ।।
कुरुवंशी नरेशोंमें श्रेष्ठ राजराजेश्वर शान्तनुके शासन कालमें सबकी वाणी सत्यके आश्रित थी- सभी सत्य बोलते थे और सबका मन दान एवं धर्ममें लगता था ।। १९ ।।
स समाः षोडशाष्टौ च चतस्रोऽष्टौ तथापराः । रतिमप्राप्नुवन् स्त्रीषु बभूव वनगोचरः ।। २० ।।
राजा शान्तनु सोलह, आठ, चार और आठ कुल छत्तीस वर्षोंतक स्त्रीविषयक अनुरागका अनुभव न करते हुए वनमें रहे ।। २० ।।
तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः ।
गाङ्गेयस्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो वसुः ।। २१ ।।
वसुके अवतारभूत गांगेय उनके पुत्र हुए, जिनका नाम देवव्रत था। वे पिताके समान ही रूप, आचार, व्यवहार तथा विद्यासे सम्पन्न थे ।। २१ ।।
सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च।
महाबलो महासत्त्वो महावीर्यो महारथः ।। २२ ।।
लौकिक और अलौकिक सब प्रकारके अस्त्रशस्त्रोंकी कलामें वे पारंगत थे। उनके बल, सत्त्व (धैर्य) तथा वीर्य (पराक्रम) महान् थे। वे महारथी वीर थे ।। २२ ।।
स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा गङ्गामनुसरन् नदीम् ।
भागीरथीमल्पजलां शान्तनुर्दृष्टवान् नृपः ।। २३ ।।
एक समय किसी हिंसक पशुको बाणोंसे बींधकर राजा शान्तनु उसका पीछा करते हुए भागीरथी गंगाके तटपर आये। उन्होंने देखा कि गंगाजीमें बहुत थोड़ा जल रह गया है ।। २३ ।।
तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनुः पुरुषर्षभः ।
स्वन्दते किं त्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा ।। २४ ।।
उसे देखकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज शान्तनु इस चिन्तामें पड़ गये कि यह सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी आज पहलेकी तरह क्यों नहीं बह रही है ।। २४ ।।
ततो निमित्तमन्विच्छन् ददर्श स महामनाः।
कुमारं रूपसम्पन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम् ।। २५ ।।
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् ।
कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम् ।। २६ ।।
तदनन्तर उन महामना नरेशने इसके कारणका पता लगाते हुए जब आगे बढ़कर देखा, तब मालूम हुआ कि एक परम सुन्दर मनोहर रूपसे सम्पन्न विशालकाय कुमार देवराज इन्द्रके समान दिव्यास्त्रका अभ्यास कर रहा है और अपने तीखे बाणोंसे समूची गंगाकी धाराको रोककर खड़ा है ।। २५-२६ ।।
तां शरैराचितां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्ति के।
अभवद् विस्मितो राजा दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् ।। २७ ।।
राजाने उसके निकटकी गंगा नदीको उसके बाणोंसे व्याप्त देखा। उस बालकका यह अलौकिक कर्म देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।। २७ ।।
जातमात्रं पुरा दृष्ट्वा तं पुत्रं शान्तनुस्तदा।
नोपलेभे स्मृतिं धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम् ।। २८ ।।
शान्तनुने अपने पुत्रको पहले पैदा होनेके समय ही देखा था; अतः उन बुद्धिमान् नरेशको उस समय उसकी याद नहीं आयी; इसीलिये वे अपने ही पुत्रको पहचान न सके ।। २८ ।।
स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहयामास मायया ।
सम्मोह्य तु ततः क्षिप्रं तत्रैवान्तरधीयत ।। २९ ।।
बालकने अपने पिताको देखकर उन्हें मायासे मोहित कर दिया और मोहित कर दिया और मोहित करके शीघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया ।। २९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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