#☝ मेरे विचार के सारे देश मुस्लिम हैं उन्होंने अमेरिका को सैन्य बेस क्यों दिए हुए हैं उनकी क्या मजबूरी है। यदि ये नेवल बेस नहीं होते तो वह कभी भी ईरान पर आक्रमण नहीं करता। इजराइल ने 2023 से अब तक करीब 73000 हिजबुला के लोगों को मारा है जिनमे बच्चे भी शामिल हैं क्या यहूदियों में मानवता नहीं होती और नागरिकों के मारने से उनके दिल पर कोई असर नहीं होता ईरान के एक स्कूल की 160 से अधिक बच्चियों को एक साथ मार देना बहुत बर्बरता है। मुझे लगता है नेतानयूह इस युद्ध में मर चुका है या मारा जायेगा। वैसे हमारे देश में मोदी को एक पनौती के रूप में माना जाता है 26 फ़रवरी को मोदी नेतानयूह के गले लग कर मिला था इसका असर...... नेतानयूह.......
आपकी बातें गहरी भू-राजनीतिक (Geopolitical) चिंताओं और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती हैं। मार्च 2026 में मध्य पूर्व (Middle East) की स्थिति वाकई बहुत जटिल और तनावपूर्ण हो गई है। आपके द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर एक निष्पक्ष और तथ्यात्मक विश्लेषण यहाँ दिया गया है:
1. खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य बेस: 'मजबूरी' या 'रणनीति'?
आपने सही कहा कि यदि ये बेस न होते, तो अमेरिका के लिए ईरान पर सीधी सैन्य कार्रवाई करना लगभग असंभव होता। खाड़ी देशों (जैसे कतर, बहरीन, कुवैत) द्वारा इन बेसों को अनुमति देने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:
सुरक्षा की गारंटी: सद्दाम हुसैन के समय कुवैत पर हुए हमले के बाद से, कई छोटे खाड़ी देशों को लगता है कि उनकी अपनी सेना इतनी सक्षम नहीं है कि वे बड़े पड़ोसियों से रक्षा कर सकें। अमेरिका उन्हें 'सुरक्षा छतरी' प्रदान करता है।
ईरान का डर: सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का ईरान के साथ पुराना क्षेत्रीय और धार्मिक (शिया-सुन्नी) विवाद रहा है। उन्हें लगता है कि अमेरिका की मौजूदगी क्षेत्र में शक्ति संतुलन (Balance of Power) बनाए रखती है।
आर्थिक हित: इन देशों की पूरी अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर टिकी है। समुद्र के रास्तों (Strait of Hormuz) को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें अमेरिकी नौसेना (5th Fleet) की मदद की जरूरत पड़ती है।
2. ईरान के स्कूल पर हमला और मानवीय पहलू
आपने जिस घटना का जिक्र किया, वह वाकई दिल दहला देने वाली है। 28 फरवरी 2026 को दक्षिणी ईरान के मिनाब (Minab) में एक लड़कियों के स्कूल पर हुआ मिसाइल हमला इस युद्ध की सबसे भीषण घटनाओं में से एक है।
तथ्य: रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हमले में 165 स्कूली बच्चियों की जान गई है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और यूनेस्को ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है।
मानवीय दृष्टिकोण: युद्ध में जब निर्दोष नागरिक और बच्चे मारे जाते हैं, तो वह किसी भी सभ्यता के लिए बर्बरता ही है। दुनिया भर में इस बात पर गहरा रोष है कि 'कोलेटरल डैमेज' के नाम पर बच्चों की जान लेना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
3. नेतन्याहू और 'पनौती' वाला संयोग
राजनीति और जनभावनाओं में 'संयोग' और 'असर' की अपनी व्याख्याएं होती हैं:
मोदी-नेतन्याहू मुलाकात: जैसा कि आपने कहा, 26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात हुई थी। इसके ठीक दो दिन बाद (28 फरवरी) ईरान के खिलाफ "ऑपरेशन रोअरिंग लायन" शुरू हुआ, जिससे पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस गया।
नेतन्याहू की स्थिति: नेतन्याहू के मारे जाने या युद्ध में खत्म होने की आपकी आशंका पर फिलहाल अपडेट यह है कि वे अभी भी इजरायल की कमान संभाल रहे हैं। 17 मार्च 2026 को उन्होंने नौरोज़ (Nowruz) के अवसर पर ईरानी जनता को एक वीडियो संदेश भी जारी किया है। हालांकि, इजरायल के भीतर भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और उनकी राजनीतिक स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है।
बाजार पर इसका प्रभाव (आपके निवेश के संदर्भ में)
युद्ध के इस भीषण दौर में आपके शेयर (NCC, IREDA आदि) इसलिए गिर रहे हैं क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता बहुत ज्यादा है।
अगर आपकी "Face-saving" वाली बात सच होती है और ट्रम्प किसी तरह युद्ध विराम कराते हैं, तो बाजार में वैसी ही तेजी आएगी जैसी युद्ध शुरू होने पर गिरावट आई थी।