sn vyas
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६५ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड पचासीवाँ सर्ग गुह और भरतकी बातचीत तथा भरतका शोक निषादराज गुहके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् भरतने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनोंमें उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥१॥ 'भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीरामके सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेनाका सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो—तुम्हारी श्रद्धासे ही हम सब लोगोंका सत्कार हो गया'॥२॥ यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरतने गन्तव्य मार्गको हाथके संकेतसे दिखाते हुए पुनः गुहसे उत्तम वाणीमें पूछा—॥३॥ 'निषादराज! इन दो मार्गोंमेंसे किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाना होगा? गङ्गाके किनारेका यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है'॥४॥ बुद्धिमान् राजकुमार भरतका यह वचन सुनकर वनमें विचरनेवाले गुहने हाथ जोड़कर कहा—॥५॥ 'महाबली राजकुमार! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेशसे पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा॥६॥ 'परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है'॥७॥ ऐसी बात कहते हुए गुहसे आकाशके समान निर्मल भरतने मधुर वाणीमें कहा—॥८॥ 'निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिताके समान मानता हूँ॥९॥ 'ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वनमें निवास करते हैं, अतः उन्हें लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये'॥१०॥ भरतकी बात सुनकर निषादराजका मुँह प्रसन्नतासे खिल उठा। वह हर्षसे भरकर पुनः भरतसे बोला—॥११॥ 'आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्नके हाथमें आये हुए राज्यको त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डलमें कोई नहीं दिखायी देता॥१२॥ 'कष्टप्रद वनमें निवास करनेवाले श्रीरामको जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकोंमें आपकी अक्षय कीर्तिका प्रसार होगा॥१३॥ जब गुह भरतसे इस प्रकारकी बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेवकी प्रभा अदृश्य हो गयी और रातका अन्धकार सब ओर फैल गया॥१४॥ गुहके बर्तावसे श्रीमान् भरतको बड़ा संतोष हुआ और वे सेनाको विश्राम करनेकी आज्ञा दे शत्रुघ्नके साथ शयन करनेके लिये गये॥१५॥ धर्मपर दृष्टि रखनेवाले महात्मा भरत शोकके योग्य नहीं थे तथापि उनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके लिये चिन्ताके कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥१६॥ जैसे वनमें फैले हुए दावानलसे संतप्त हुए वृक्षको उसके खोखलेमें छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ताकी आगसे संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरतको वह राम-वियोगसे उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी॥१७॥ जैसे सूर्यकी किरणोंसे तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फको बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्निसे संतप्त होनेके कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गोंसे पसीना बहाने लगे॥१८॥ उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःखके विशाल पर्वतसे आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओंका समूह था। दुःखपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातुका स्थान ले रहा था। दीनता (इन्द्रियोंकी अपने विषयोंसे विमुखता) ही वृक्षसमूहोंके रूपमें प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वतके ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर-भीतरकी इन्द्रियोंमें होनेवाले संताप ही उस पर्वतकी ओषधियाँ तथा बाँसके वृक्ष थे॥१९-२०॥ उनका मन बहुत दुःखी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्तिमें पड़ गये। मानसिक चिन्तासे पीड़ित होनेके कारण नरश्रेष्ठ भरतको शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंडसे बिछुड़े हुए वृषभकी-सी हो रही थी॥२१॥ परिवारसहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुहसे मिले, उस समय उनके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाईके लिये चिन्तित थे, अतः गुहने उन्हें पुनः आश्वासन दिया॥२२॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८५॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५