sn vyas
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१३५
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
चौवनवाँ सर्ग
लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामका प्रयागमें गङ्गा-यमुना-संगमके समीप भरद्वाज-आश्रममें जाना, मुनिके द्वारा उनका अतिधिसत्कार, उन्हें चित्रकूट पर्वतपर ठहरनेका आदेश तथा चित्रकूटकी महत्ता एवं शोभाका वर्णन
उस महान् वृक्षके नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकालमें उस स्थानसे आगेको प्रस्थित हुए॥१॥
जहाँ भागीरथी गङ्गासे यमुना मिलती हैं, उस स्थानपर जानेके लिये वे महान् वनके भीतरसे होकर यात्रा करने लगे॥२॥
वे तीनों यशस्वी यात्री मार्गमें जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकारके भू-भाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे॥३॥
सुखपूर्वक आरामसे उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन तीनोंने फूलोंसे सुशोभित भाँति-भाँतिके वृक्षोंका दर्शन किया। इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥४॥
'सुमित्रानन्दन! वह देखो, प्रयागके पास भगवान् अग्निदेवकी ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं॥५॥
'निश्चय ही हमलोग गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके पास आ पहुँचे हैं; क्योंकि दो नदियोंके जलोंके परस्पर टकरानेसे जो शब्द प्रकट होता है, वह सुनायी दे रहा है॥६॥
'वनमें उत्पन्न हुए फल-मूल और काष्ठ आदिसे जीविका चलानेवाले लोगोंने जो लकड़ियाँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकड़ियाँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकारके वृक्ष भी आश्रमके समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं'॥७॥
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते-होते गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके समीप मुनिवर भरद्वाजके आश्रमपर जा पहुँचे॥८॥
श्रीरामचन्द्रजी आश्रमकी सीमामें पहुँचकर अपने धनुर्धर वेशके द्वारा वहाँके पशु-पक्षियोंको डराते हुए दो ही घड़ीमें तै करनेयोग्य मार्गसे चलकर भरद्वाज मुनिके समीप जा पहुँचे॥९॥
आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये॥१०॥
(दूर खड़े हो महर्षिके शिष्यसे अपने आगमनकी सूचना दिलवाकर भीतर आनेकी अनुमति प्राप्त कर लेनेके बाद) पर्णशालामें प्रवेश करके उन्होंने तपस्याके प्रभावसे तीनों कालोंकी सारी बातें देखनेकी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेनेवाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्योंसे घिरे हुए आसनपर विराजमान थे। महर्षिको देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीरामने हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥११-१२॥
तत्पश्चात् लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया—'भगवन्! हम दोनों राजा दशरथके पुत्र हैं। मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवनमें भी मेरा साथ देनेके लिये आयी हैं॥१३-१४॥
'पिताकी आज्ञासे मुझे वनकी ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वनमें ही रहनेका व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं॥१५॥
'भगवन्! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे हम तीनों तपोवनमें जायँगे और वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए धर्मका ही आचरण करेंगे'॥१६॥
परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीरामका वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनिने उनके लिये आतिथ्य-सत्कारके रूपमें एक गौ तथा अर्घ्य-जल समर्पित किये॥१७॥
उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकारके अन्न, रस और जंगली फल-मूल प्रदान किये। साथ ही उनके ठहरनेके लिये स्थानकी भी व्यवस्था की॥१८॥
महर्षिके चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके बीचमें वे विराजमान थे। उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथिरूपमें पधारे हुए श्रीरामका स्वागतपूर्वक सत्कार किया। उनके उस सत्कारको ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसनपर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजीने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा—॥१९-२०॥
'ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रमपर दीर्घकालसे तुम्हारे शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ (आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है)। मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है॥२१॥
'गङ्गा और यमुना—इन दोनों महानदियोंके संगमके पासका यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है। यहाँकी प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अतः तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो'॥२२॥
भरद्वाज मुनिके ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले रघुकुलनन्दन श्रीरामने इन शुभ वचनोंके द्वारा उन्हें उत्तर दिया—॥२३॥
'भगवन्! मेरे नगर और जनपदके लोग यहाँसे बहुत निकट पड़ते हैं, अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रमपर मुझे और सीताको देखनेके लिये प्रायः आते-जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता॥२४॥
'भगवन्! किसी एकान्त प्रदेशमें आश्रमके योग्य उत्तम स्थान देखिये (सोचकर बताइये), जहाँ सुख भोगनेके योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें॥२६॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजीने उनके उक्त उद्देश्यकी सिद्धिका बोध करानेवाली बात कही—॥२७॥
'तात! यहाँसे दस कोस (अन्य व्याख्याके अनुसार ३० कोस) की दूरीपर एक सुन्दर और महर्षियोंद्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, जिसपर तुम्हें निवास करना होगा॥२८॥
'उसपर बहुत-से लंगूर विचरते रहते हैं। वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं। वह पर्वत चित्रकूट नामसे विख्यात है और गन्धमादनके समान मनोहर है॥२९॥
'जब मनुष्य चित्रकूटके शिखरोंका दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मोंका फल पा लेता है और कभी पापमें मन नहीं लगाता है॥३०॥
'वहाँ बहुत-से ऋषि, जिनके सिरके बाल वृद्धावस्थाके कारण खोपड़ीकी भाँति सफेद हो गये थे, तपस्याद्वारा सैकड़ों वर्षोंतक क्रीड़ा करके स्वर्गलोकको चले गये हैं॥३१॥
'उसी पर्वतको मैं तुम्हारे लिये एकान्तवासके योग्य और सुखद मानता हूँ अथवा श्रीराम! तुम वनवासके उद्देश्यसे मेरे साथ इस आश्रमपर ही रहो'॥३२॥
ऐसा कहकर भरद्वाजजीने पत्नी और भ्रातासहित प्रिय अतिथि श्रीरामका हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा उन सबका आतिथ्यसत्कार किया॥३३॥
प्रयागमें श्रीरामचन्द्रजी महर्षिके पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतनेमें ही पुण्यमयी रात्रिका आगमन हुआ॥३४॥
वे सुख भोगनेयोग्य होनेपर भी परिश्रमसे बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनिके उस मनोहर आश्रममें श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की॥३५॥
तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेजवाले भरद्वाज मुनिके पास गये और बोले—॥३६॥
'भगवन्! आप स्वभावतः सत्य बोलनेवाले हैं। आज हमलोगोंने आपके आश्रममें बड़े आरामसे रात बितायी है, अब आप हमें आगेके गन्तव्य स्थानपर जानेके लिये आज्ञा प्रदान करें'॥३७॥
रात बीतने और सबेरा होनेपर श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजजीने कहा—'महाबली श्रीराम! तुम मधुर फल-मूलसे सम्पन्न चित्रकूट पर्वतपर जाओ। मैं उसीको तुम्हारे लिये उपयुक्त निवासस्थान मानता हूँ।
'वह सुविख्यात चित्रकूट पर्वत नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरा-भरा है। वहाँ बहुत-से किन्नर और सर्प निवास करते हैं। मोरोंके कलरवोंसे वह और भी रमणीय प्रतीत होता है। बहुत-से गजराज उस पर्वतका सेवन करते हैं। तुम वहीं चले जाओ॥३९-४०॥
'वह पर्वत परम पवित्र, रमणीय तथा बहुसंख्यक फल-मूलोंसे सम्पन्न है। वहाँ झुंड-के-झुंड हाथी और हिरन वनके भीतर विचरते रहते हैं। रघुनन्दन! तुम उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे। मन्दाकिनी नदी, अनेकानेक जलस्रोत, पर्वतशिखर, गुफा, कन्दरा और झरने भी तुम्हारे देखनेमें आयेंगे। वह पर्वत सीताके साथ विचरते हुए तुम्हारे मनको आनन्द प्रदान करेगा॥४१-४२॥
'हर्षमें भरे हुए टिट्टिभ और कोकिलोंके कलरवोंद्वारा वह पर्वत यात्रियोंका मनोरञ्जन-सा करता है। वह परम सुखद एवं कल्याणकारी है, मदमत्त मृगों और बहुसंख्यक मतवाले हाथियोंने उसकी रमणीयताको और बढ़ा दिया है। तुम उसी पर्वतपर जाकर डेरा डालो और उसमें निवास करो'॥४३॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५४॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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