#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣3️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 313)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा ।
न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ।। ८३ ।।
परंतप ! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।।
एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।। ८४ ।।
पृथ्वीनाथ ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप ! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।। ८५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया - ।। ८५ ।।
इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर । नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।।
'सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज ! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।।
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे ।
योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।। ८७ ।।
'लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा' ।। ८७ ।।
इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत ।
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ।। ८८ 11
भरतवंशावतंस जनमेजय ! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला। वह राज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ।। ८८ ।।
त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते।
कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वरः ।। ८९ ।।
उसने कहा- 'अमित तेजस्वी युवराज ! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिक बनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन् ! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है। आप जिसे चाहें, इसे दे सकते हैं। आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ।। ८९ ।।
इदं तु वचनं सौम्य कार्य चैव निबोध मे ।
कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ।। ९० ।।
'परंतु सौम्य ! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है; अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये। शत्रुदमन ! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ।। ९० ।।
यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण । राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ।। ९१ ।।
'सत्यधर्मपरायण राजकुमार ! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ।। ९१ ।।
नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन। तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ।। ९२ ।।
'महाबाहो ! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है' ।। ९२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️