#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣8️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रिनवतितमोऽध्यायः
राजा ययाति का वसुमान् और शिबि के प्रतिग्रह को अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओं के साथ स्वर्ग में जाना...(दिन 284)
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वसुमानुवाच
पृच्छामि त्वां वसुमानौषदश्वि-र्यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र । यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन् क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। १ ।।
वसुमान्ने कहा- नरेन्द ! मैं उषदश्वका पुत्र वसुमान् हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन् ! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ।। १ ।।
ययातिरुवाच
यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च यत्तेजसा तपते भानुमांश्च । लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ।। २ ।।
ययातिने कहा- राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं; उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे अन्तवान् न होकर चिरस्थायी हैं और आपकी प्रतीक्षा करते हैं ।। २ ।।
वसुमानुवाच
तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु । क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राजन् प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन् प्रदुष्टः ।। ३ ।।
वसुमान् बोले- राजन् ! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, आप नीचे न गिरें। मेरे लिये जितने पुण्यलोक हैं, वे सब आपके हो जायें। धीमन् ! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठी तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको खरीद लें ।। ३ ।।
ययातिरुवाच
न मिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामि वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः । कुर्या न चैवाकृतपूर्वमन्यै-र्विधित्समानः किमु तत्र साधु ।। ४ ।।
ययाति ने कहा- मैंने इस प्रकार कभी झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो अथवा छलपूर्वक व्यर्थ कोई वस्तु ली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। मैं कालचक्रसे शंकित रहता हूँ। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया वह कार्य में भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ।। ४ ।।
वसुमानुवाच
तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन् मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते । अहं न तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।। ५ ।।
वसुमान् बोले- राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र ! निश्चय जानिये, मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें ।। ५ ।।
शिबिरुवाच
पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं ममापि लोका यदि सन्तीह तात । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। ६ ।।
शिबिने कहा-तात ! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों, तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ।। ६ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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