Jaswant Dass
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1 days ago
. ऋषि रामानन्द के आश्रम में दो रूप धारण करना’’ स्वामी रामानन्द जी ने परमेश्वर कबीर जी से कहा कि ‘‘आपने झूठ क्यों बोला?’’ कबीर परमेश्वर जी बोले! कैसा झूठ स्वामी जी? स्वामी रामानन्द जी ने कहा कि आप कह रहे थे कि आपने मेरे से नाम ले रखा है। आपने मेरे से उपदेश कब लिया? बालक रूपधारी कबीर परमेश्वर जी बोले एक समय आप स्नान करने के लिए पँचगंगा घाट पर गए थे। मैं वहाँ लेटा हुआ था। आपके पैरों की खड़ाऊँ मेरे सिर में लगी थी! आपने कहा था कि बेटा राम नाम बोलो। रामानन्द जी बोले-हाँ, अब कुछ याद आया। परन्तु वह तो बहुत छोटा बच्चा था (क्योंकि उस समय पाँच वर्ष की आयु के बच्चे बहुत बड़े हो जाया करते थे तथा पाँच वर्ष के बच्चे के शरीर तथा ढ़ाई वर्ष के बच्चे के शरीर में दुगुना अन्तर हो जाता है)। कबीर परमेश्वर जी ने कहा स्वामी जी देखो, मैं ऐसा था। स्वामी रामानन्द जी के सामने भी खड़े हैं और एक ढाई वर्षीय बच्चे का दूसरा रूप बना कर किसी सेवक की वहाँ पर चारपाई बिछी थी उसके ऊपर विराजमान हो गए। रामानन्द जी ने छः बार तो इधर देखा और छः बार उधर देखा। फिर आँखें मलमल कर देखा कि कहीं तेरी आँखें धोखा तो नहीं खा रही हैं। इस प्रकार देख ही रहे थे कि इतने में कबीर परमेश्वर जी का छोटे वाला रूप हवा में उड़ा और कबीर परमेश्वर जी के बड़े पाँच वर्ष वाले स्वरूप में समा गया। पाँच वर्ष वाले स्वरूप में कबीर परमेश्वर जी रह गए। रामानन्द जी बोले कि मेरा संशय मिट गया कि आप ही पूर्ण ब्रह्म हो। हे परमेश्वर! आपको कैसे पहचान सकते हैं। आप किस जाति में उत्पन्न तथा कैसी वेश भूषा में खड़े हो। हम अज्ञानी प्राणी आप के साथ वाद-विवाद करके दोषी हो गए, क्षमा करना परमेश्वर कविर्देव, मैं आपका अनजान बच्चा हूँ। रामानन्द जी ने फिर अपनी अन्य शंकाओं का निवारण करवाया। हे कविर्देव! मैं राम-राम कोई मन्त्र शिष्यों को जाप करने को नहीं देता। यदि आपने मुझसे दीक्षा ली है तो वह मन्त्र बताईए जो मैं शिष्य को जाप करने को देता हूँ। कबीर देव ने कहा कि हे स्वामी जी! आप ओम् नाम जाप करने को देते हो तथा ओ3म् भगवते वासुदेवाय नमः का जाप तथा विष्णु स्त्रोत की आवर्ती की भी आज्ञा देते हो। स्वामी रामानंद जी ने कहा कि आपने जो मन्त्र बताया यह तो सही है। एक शंका और है उसका भी निवारण कीजिए। मैं जिसे शिष्य बनाता हूँ उसे एक चिन्ह देता हूँ। वह आपके पास नहीं है। बन्दी छोड़ कबीर देव बोले हे गुरुदेव! आप तुलसी की लकड़ी के एक मणके की कण्ठी (माला) गले में पहनने के लिए देते हो। यह देखो गुरु जी उसी दिन आपने अपनी कण्ठी गले से निकाल कर मेरे गले में पहनाई थी। यह कहते हुए कविर्देव ने अपने कुर्ते के नीचे गले में पहनी वही कण्ठी (माला) सार्वजनिक कर दी तथा कहा कि आप स्वर्ग में जाने की इच्छा का त्याग करो। मेरा ज्ञान सुनो। सनातन परम धाम में जाने की साधना करो। ए स्वामी तुम स्वर्ग की, छांडौ आशा रीति। गरीबदास तुम कारणैं, उतरे शब्दातीत।।485।। सुनि बच्चा में स्वर्ग की कैसैं छांडौं रीति। गरीबदास गुदरी लगी, जनम जात है बीत।।486।। च्यारि मुक्ति बैकुंठ में, जिन की मोरै चाह। गरीबदास घर अगम की, कैसैं पाऊं थाह।।487।। हेम रूप जहाँ धरणि है, रतन जड़े बौह शोभ। गरीबदास बैकुंठ कूं, तन मन हमरा लोभ।।488।। शंख चक्र गदा पदम हैं, मोहन मदन मुरारि। गरीबदास मुरली बजै, सुरगलोक दरबारि।।489।। दूधौं की नदियां बगैं, सेत वृक्ष सुभांन। गरीबदास मंदल मुक्ति, सुरगापुर अस्थान।।490।। रतन जड़ाऊ मनुष्य हैं, गण गंधर्व सब देव। ‌‌। गरीबदास उस धाम की, कैसे छाडूं सेव।।491।। ऋग युज साम अथर्वणं, गावैं चारौं बेद। गरीबदास घर अगम का, कैसे जानो भेद।।492।। च्यारि मुक्ति चितवन लगी, कैसैं बंचूं ताहि। गरीबदास गुप्तारगति, हमकूं द्यौ समझाय।।493।। सुरग लोक बैकुंठ है, यासैं परै न और। गरीबदास षट्शास्त्र, च्यारि बेदकी दौर।।494।। च्यारि बेद गावैं तिसैं, सुरनर मुनि मिलाप। गरीबदास धु्रव पोर जिस, मिटि गये तीनूं ताप।। प्रहलाद गये तिस लोककूं, सुरगा पुरी समूल। गरीबदास हरि भक्ति की, मैं बंचत हूं धूल।।496 बिंद्रावन खेले सही, रज केसर समतूल। गरीबदास उस मुक्ति कूं, कैसैं जाऊं भूल।।497 नारद ब्रह्मा जिस रटैं, गावैं शेष गणेश। गरीबदास बैकुंठ सैं, और परै को देश।।498।। सहंस अठासी जिस जपैं, और तेतीसौं सेव। गरीबदास जासैं परै, और कौन है देव।।499।। स्वामी रामानंद जी ने कहा कि हे बच्चा! मैं 104 वर्ष का वृद्ध हो चुका हूँ। सारा जीवन स्वर्ग प्राप्ति की साधना करके व्यतीत कर दिया। अब स्वर्ग जाने की आशा कैसे त्यागूँ? बताते हैं कि स्वर्ग में चार मुक्ति प्राप्त होती हैं। मुझे उनकी प्राप्ति की इच्छा है। जो इससे आगे वाले स्थान (अगम घर) सतलोक का (थाह) अंत कैसे प्राप्त करूँ? मेरा तो जीवन अंत होने वाला है। विष्णु जी के लोक की धरती (हेम) हिम यानि बर्फ जैसी सफेद है। रत्न स्थान-स्थान पर लगे हैं जो स्वर्ग की शोभा बढ़ा रहे हैं। श्री कृष्ण मनमोहन यानि श्री विष्णु जी चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पदम लिए हैं। उस स्वर्ग लोक में श्री कृष्ण जी मुरली बजाते हैं। स्वर्ग लोक में दूधों की नदियां बहती हैं। सब वृक्ष (सेत) सफेद हैं, (सुभान) उत्तम हैं। सब मनुष्यों के शरीर में स्थान-स्थान पर तिल के स्थान पर रत्न लगे हैं। गण, गंधर्व तथा सब देवताओं के शरीरों पर भी लाल लगे हैं। उस सुंदर स्वर्ग धाम की (सेव) भक्ति कैसे छोड़ूँ? ऋग, यजु, साम, अथर्वण, ये चारों वेद स्वर्ग तक का ज्ञान देते हैं। उस (अगम घर) सतलोक का भेद मैं कैसे जानूँ? स्वर्ग लोक यानि बैकुण्ठ से परे और कौन-सा देश (लोक) है? मुझे अच्छी तरह समझा। मुझे चार मुक्तियों की (चितवन) लगन लगी है। उसे कैसे छोड़ूँ? चार वेद और (षट्) छः शास्त्रों की दौड़ तो स्वर्ग तक ही है यानि इनमें तो स्वर्ग तक का ज्ञान है। ध्रुव भी स्वर्ग में गया। प्रहलाद भी स्वर्ग में गया। मैं भी उसी भगवान विष्णु की भक्ति करके स्वर्ग जाने की इच्छा कर रहा हूँ। वृंदावन (मथुरा) में श्री कृष्ण रूप में (खेले) रास किया। हमारे लिए उस स्थान की (रज) धूल तो केसर के समान है। हे कबीर जी! उस स्वर्ग जाने वाली मुक्ति को कैसे भूल जाऊँ? नारद मुनि जी, अठासी हजार ऋषि, ब्रह्मा जी, शेष, गणेश आदि स्वर्ग का गुणगान करते हैं। इससे (परे) अन्य कौन-सा देश हो सकता है? तेतीस करोड़ देवता, अठासी हजार ऋषि भी श्री विष्णु की पूजा करते हैं। इससे (परै) अन्य कौन प्रभु हो सकता है? सुनि स्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊं तोहि। गरीबदास भगवान कूं, राख्या जगत समोहि।।500।। तीनि लोक के जीव सब, विषय वास भरमाय। गरीबदास हमकूं जपैं, तिसकूं धाम दिखाय।।501।। जो देखैगा धाम कूं, सो जानत है मुझ। गरीबदास तोसैं कहूं, सुनि गायत्रा गुझ।।502।। कृष्ण बिष्णु भगवान कूं, जहडायें हैं जीव। गरीबदास त्रिलोक में, काल कर्म शिर शीव।।503।। सुनि स्वामी तोसैं कहूं, अगम दीप की सैल। गरीबदास पूठे परें, पुस्तक लादें बैल।।504।। पौहमी धरणि अकाश थंभ, चलसी चंदर सूर। गरीबदास रज बिरजकी, कहाँ रहैगी धूर।।505।। तारायण त्रिलोक सब, चलसी इन्द्र कुबेर। गरीबदास सब जात हैं, सुरग पाताल सुमेर।।506।। च्यारि मुक्ति बैकुंठ बट, फना हुआ कई बार। गरीबदास सतलोक को, नहीं जानैं संसार।।507।। कहौ स्वामी कित रहौगे, चौदा भुवन बिहंड। गरीबदास बीजक कह्या, चलत प्राण और पिंड।। सुन स्वामी एक शक्ति है, अरधंगी ¬कार। गरीबदास बीजक तहां, अनेक लोक सिंघार।।509।। जैसे का तैसा रहै, परलो फना प्रान। गरीबदास उसकी शक्तिकूं, बार बार कुरबांन।।510।। कोटि इन्द्र ब्रह्मा जहाँ, कोटि कृष्ण कैलास। गरीबदास शिब कोटि हैं, करौ कौंन की आश।।511।। कोटि बिष्णु जहाँ बसत हैं, उस शक्ति के धाम। गरीबदास गुल बौहत हैं, अलफ बस्त निहकाम।। शिब शक्ति जासै हुए, अनंत कोटि अवतार। गरीबदास उस अलफकूं, लखै सो होय करतार।। सतपुरूष हम स्वरूप है, तेज पुंज का कंत। गरीबदास गुलसैं परै, चलना है बिन पंथ।।514।। बिना पंथ उस कंतकै, धाम चलन है मोर। गरीबदास गति ना किसी, संख सुरग पर डोर।। #GodNightFriday #TrueWorship_EndsSuffering Sa True Story YouTube #कबीर