कबीर
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Jaswant Dass
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#GodNightTuesday #Annapurna_Muhim_SantRampalJi . नानक साहेब जी प्रभु कबीर साहिब जी का मिलना साहिब मेरा एको है। एको है भाई एको है। आपे रूप करे बहु भांती नानक बपुड़ा एव कह।। जो तिन कीआ सो सचु थीआ,अमृत नाम सतगुरु दीआ।। गुरु पुरे ते गति मति पाई। बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे। सतिगुरु राखे से बड़ भागे, नानक गुरु की चरणों लागे। मैं गुरु पूछिआ अपणा साचा बिचारी राम। उपरोक्त वाणीया गुरूग्रंथ साहिब मे से अलग अलग स्थान से ली है। अमृतवाणी में श्री नानक साहेब जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि साहिब एक ही है तथा मेरे गुरु जी ने मुझे उपदेश नाम मन्त्रा दिया, वही नाना रूप धारण कर लेता है अर्थात् वही सतपुरुष है वही जिंदा रूप बना लेता है। वही धाणक रूप में भी विराजमान होकर आम व्यक्ति अर्थात् भक्त की भूमिका करता है। शास्त्रा विरुद्ध पूजा करके सारे जगत् को जन्म-मृत्यु व कर्मफल की आग में जलते देखकर जीवन व्यर्थ होने के डर से भाग कर मैंने गुरु जी के चरणों में शरण ली। बलिहारी गुरु आपणे दिउहाड़ी सदवार। जिन माणस ते देवते कीए करत न लागी वार। आपीनै आप साजिओ आपीनै रचिओ नाउ। दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ। दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ। तूं जाणोइ सभसै दे लैसहि जिंद कवाउ करि आसणु डिठो चाउ। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा जिंदा का रूप बनाकर बेई नदी पर आए अर्थात् जिंदा कहलाए तथा स्वयं ही दो दुनिया ऊपर तथा नीचे को रचकर ऊपर सत्यलोक में आकार में आसन पर बैठ कर चाव के साथ अपने द्वारा रची दुनियाँ को देख रहे हो तथा आप ही स्वयम्भू अर्थात् माता के गर्भ से जन्म नहीं लेते, स्वयं प्रकट होते हो। यही प्रमाण पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मं. 8 में है कि कविर् मनीषि स्वयम्भूः परिभू व्यवधाता, भावार्थ है कि कबीर परमात्मा सर्वज्ञ है। तथा अपने आप प्रकट होता है। वह सनातन अर्थात् सर्वप्रथम वाला प्रभु है। वह सर्व ब्रह्मण्डों का अर्थात् भिन्न-भिन्न सर्व लोकों का रचनहार है। एहू जीउ बहुते जन्म भरमिआ,ता सतिगुरु शबद सुणाइया भावार्थ है कि श्री नानक साहेब जी कह रहे हैं कि मेरा यह जीव बहुत समय से जन्म तथा मृत्यु के चक्र में भ्रमता रहा अब पूर्ण सतगुरु ने वास्तविक नाम प्रदान किया। श्री नानक जी के पूर्व जन्म सतयुग में राजा अम्ब्रीष, त्रोतायुग में राजा जनक हुए थे और फिर नानक जी हुए तथा अन्य योनियों के जन्मों की तो गिनती ही नहीं है। इस निम्न लेख में प्रमाणित है कि कबीर साहेब तथा नानक जी की वार्ता हुई है। यह भी प्रमाण है कि राजा जनक विदेही भी श्री नानक जी थे तथा श्री सुखदेव जी भी राजा जनक का शिष्य हुआ था। पराण संगली पंजाबी लीपी संपादक: डाॅ. जगजीत सिह खानपुरी पब्लिकेशन ब्यूरो पंजाबी युनिवर्सिटी, पटियाला। प्रकाशित सन् 1961 के पृष्ठ न. 399 से सहाभार गोष्टी बाबे नानक और कबीर जी की उह गुरुजी चरनि लागि करवै,बीनती को पुन करीअहु देवा अगम अपार अभै पद कहिए, सो पाईए कित सेवा।। मुहि समझाई कहहु गुरु पूरे, भिन्न-भिन्न अर्थ दिखावहु। जिह बिधि परम अभै पद पाईये, सा विधि मोहि बतावहु। मन बच करम कृपा करि दीजै, दीजै शब्द उचारं।। कहै कबीर सुनहु गुरु नानक, मैं दीजै शब्द बीचारं।। (नानक जी) नानक कह सुनों कबीर जी, सिखिया एक हमारी। तन मन जीव ठौर कह ऐकै, सुंन लागवहु तारी।। करम अकरम दोऊँ तियागह, सहज कला विधि खेलहु। जागत कला रहु तुम निसदिन, सतगुरु कल मन मेलहु।। तजि माया र्निमायल होवहु, मन के तजहु विकारा। नानक कह सुनहु कबीर जी, इह विधि मिलहु अपारा। (कबीर जी) गुरुजी माया सबल निरबल जन तेरा,क्युं अस्थिर मन होई काम क्रोध व्यापे मोकु, निस दिन सुरति निरत बुध खोई।। मन राखऊ तवु पवण सिधारे, पवण राख मन जाही। मन तन पवण जीवैं होई एकै, सा विधि देहु बुझााई।। (नानक जी) दिृढ करि आसन बैठहु वाले, उनमनि ध्यान लगावहु। अलप-अहार खण्ड कर निन्द्रा, काम क्रोध उजावहु।। नौव दर पकड़ि सहज घट राखो, सुरति निरति रस उपजै। गुरु प्रसादी जुगति जीवु राखहु, इत मंथत साच निपजै।4। (कबीर जी) कबीर कवन सुखम कवन स्थूल कवन डाल कवन है मूल गुरु जी किया लै बैसऊ, किआ लेहहु उदासी। कवन अग्नि की धुणी तापऊ कवन मड़ी महि बासी।। (नानक जी) नानक ब्रह्म सुखम सुंन असथुल, मन है पवन डाल है मूल करम लै सोवहु सुरति लै जागहु, ब्रह्म अग्नि ले तापहु। निस बासर तुम खोज खुजावहु,सुंन मण्डल ले डूम बापहु6 (सतगुरु कहै सुनहे रे चेला, ईह लछन परकासे) (गुरु प्रसादि सरब मैं पेखहु, सुंन मण्डल करि वासे) (कबीर जी) सुआमी जी जाई को कहै, ना जाई वहाँ क्या अचरज होई जाई। मन भै चक्र रहऊ मन पूरे, सा विध देहु बताई।। नानक जी अपना अनभऊ कहऊ गुरुजी, परम ज्योति किऊं पाई। ससी अर चड़त देख तुम लागे, ऊहाँ कीटी भिरणा होता। नानक कह सुनहु कबीरा, इत बिध मिल परम तत जोता। (कबीर जी) धन धन धन गुरु नानक, जिन मोसो पतित उधारो। निर्मल जल बतलाइया मो कऊ, राम मिलावन हारो।9 (नानक जी) जब हम भक्त भए सुखदेवा, जनक विदेह किया गुरुदेवा। कलिमहि जुलाहा नामकबीरा,ढूंडथे चित भईआ न थीरा। बहुतभांति कर सिमरनकीना,इहै मन चंचल तबहुन भिना। जब करि ज्ञान भए उदासी, तब न काटि कालहि फांसी।। जबहम हारपरे सतिगुरु दुआरे,दे गुरु नामदान लीए उधारे (कबीर जी) सतगुरु पुरुख सतिगुरु पाईया,सतिनाम लै रिदै बसाईआ। जात कमीना जुलाहाअपराधि,गुरुकृपा ते भगति समाधी। मुक्ति भइआ गुरु सतिगुरु बचनी, गईया सु सहसा पीरा। जुग नानक सतिगुरु जपीअ, कीट मुरीद कबीरा।। सुनि उपदेश सम्पूर्ण सतगुरु का, मन महि भया अनंद। मुक्ति का दाता बाबा नानक, रिंचक रामानन्द।। ऊपर लिखी वाणी ‘प्राण संगली‘ नामक पुस्तक से लिखी हैं। इसमें स्पष्ट लिखा है कि वाणी संख्या 9 तक दोहों में पूरी पंक्ति के अंतिम अक्षर मेल खाते हैं। परन्तु वाणी संख्या 10 की पाँच पंक्तियां तथा वाणी संख्या 11 की पहली दो पक्तियां चैपाई रूप में हैं तथा फिर दो पंक्तियां दोहा रूप में है तथा फिर वाणी संख्या 12 में केवल दो पंक्तियां हैं जो फिर दोहा रूप में है। इससे सिद्ध है कि वास्तविक वाणी को निकाला गया है जो वाणी कबीर साहेब जी के विषय में श्री नानक जी ने सतगुरु रूप में स्वीकार किया होगा। नहीं तो दोहों में चलती आ रही वाणी फिर चैपाईयों में नहीं लिखी जाती। फिर बाद में दोहों में लिखी है। यह सब जान-बूझ कर प्रमाण मिटाने के लिए किया है। वाणी संख्या 10 की पहली पंक्ति ‘जब हम भक्त भए सुखदेवा, जनक विदेही किया गुरुदेवा‘ स्पष्ट करती है कि श्री नानक जी कह रहे हैं कि मैं जनक रूप में था उस समय मेरा शिष्य श्री सुखदेव ऋषि हुए थे। इस वाणी संख्या 10 को नानक जी की ओर से कही मानी जानी चाहिए तो स्पष्ट है कि नानक जी कह रहे है कि मैं हार कर गुरू कबीर के चरणों में गिर गया उन्होंने नाम दान करके उद्धार किया। वास्तव में यह 10 नं. वाणी कही अन्य वाणी से है। यह पंक्ति भी परमेश्वर कबीर साहेब जी की ओर से वार्ता में लिख दिया है। क्योंकि परमेश्वर कबीर साहेब जी ने अपनी शक्ति से श्री नानक जी को पिछले जन्म की चेतना प्रदान की थी। तब नानक जी ने स्वीकार किया था कि वास्तव में मैं जनक था तथा उस समय सुखदेव मेरा भक्त हुआ था। वाणी संख्या 11 में चार पंक्तियां हैं जबकि वाणी संख्या 10 में पाँच पंक्तियां लिखी हैं। वास्तव में प्रथम पंक्ति ‘जब हम भक्त भए सुखदेवा . ‘ वाली में अन्य तीन पंक्तियां थी, जिनमें कबीर परमेश्वर को श्री नानक जी ने गुरु स्वीकार किया होगा। उन्हें जान बूझ कर निकाला गया लगता है। Visit Annapurna Muhim YouTube #कबीर
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Jaswant Dass
742 views 10 days ago
#GodNightFriday #MakaraSankranti26 . कबीर साहिब जी भगवान है पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी चारों युगों में आए हैं। सृष्टी व वेदों की रचना से पूर्व भी अनामी लोक में मानव सदृश कविर्देव नाम से विद्यमान थे। परमात्मा कबीर साहिब जी ने फिर सतलोक की रचना की, बाद में परब्रह्म, ब्रह्म के लोकों व वेदों की रचना की इसलिए वेदों में कविर्देव का विवरण है। यजुर्वेद के अध्याय नं. 29 के श्लोक नं. 25 जिस समय पूर्ण परमात्मा प्रकट होता है उस समय सर्व ऋषि व सन्त जन शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा कर रहे होते हैं। तब अपने तत्वज्ञान का संदेशवाहक बन कर स्वयं ही कबीर प्रभु ही आता है। कबीर परमेश्वर चारों युगों में अपने सत्य ज्ञान का प्रचार करने आते हैं। सतगुरु पुरुष कबीर हैं, चारों युग प्रवान। झूठे गुरुवा मर गए, हो गए भूत मसान।। श्रीमद्भगवद गीता अध्याय 8 का श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म भगवान ने कहा है कि वह परम अक्षर ‘ब्रह्म‘ है जो जीवात्मा के साथ सदा रहने वाला है। वह परम अक्षर ब्रह्म गीता ज्ञान दाता से अन्य है, वह कबीर परमात्मा हैं। परमात्मा शिशु रूप में प्रकट होकर लीला करता है। तब उनकी परवरिश कंवारी गायों के दूध से होती है। ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 1 मंत्र 9 यह लीला कबीर परमेश्वर ही आकर करते हैं। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 में कहा गया है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् (कबीर साहेब जी) ही है। पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) वेदों के ज्ञान से भी पूर्व सतलोक में विद्यमान थे तथा अपना वास्तविक ज्ञान (तत्वज्ञान) देने के लिए चारों युगों में भी स्वयं प्रकट हुए हैं। सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेतायुग में मुनिन्द्र नाम से, द्वापर युग में करूणामय नाम से तथा कलयुग में वास्तविक कविर्देव (कबीर प्रभु) नाम से प्रकट हुए हैं। कबीर परमात्मा अन्य रूप धारण करके कभी भी प्रकट होकर अपनी लीला करके अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। उस समय लीला करने आए परमेश्वर को प्रभु चाहने वाले श्रद्धालु नहीं पहचान पाते, क्योंकि सर्व महर्षियों व संत कहलाने वालों ने प्रभु को निराकार बताया है। वास्तव में परमात्मा आकार में है। मनुष्य सदृश शरीर युक्त है। परमेश्वर का शरीर नाड़ियों के योग से बना पांच तत्व का नहीं है। एक नूर तत्व से बना है। पूर्ण परमात्मा जब चाहे यहाँ प्रकट हो जाते हैं वे कभी मां से जन्म नहीं लेते क्योंकि वे सर्व के उत्पत्ति करता हैं। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 1 मंत्र 9 अभी इमं अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्। सोममिन्द्राय पातवे।।9।। पूर्ण परमात्मा अमर पुरुष जब लीला करता हुआ बालक रूप धारण करके स्वयं प्रकट होता है उस समय कंवारी गाय अपने आप दूध देती है जिससे उस पूर्ण प्रभु की परवरिश होती है। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निमरूतः गणेन। कविर्गीर्भि काव्येना कविर् सन्त् सोमः पवित्रम् अत्येति रेभन्।। विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर पूर्ण परमात्मा कविर्देव अपने वास्तविक ज्ञानको अपनी कविर्गिभिः अर्थात् कबीर बाणी द्वारा पुण्यात्मा अनुयाइयों को कवि रूप में कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा वर्णन करता है। वह स्वयं सतपुरुष कबीर ही होता है। कबीर परमात्मा हर युग में आते हैं ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् (कबीर प्रभु) ही है। परमात्मा कबीर जी सतयुग में सत सुकृत नाम से प्रकट हुए थे। उस समय अपनी एक प्यारी आत्मा सहते जी को अपना शिष्य बनाया ओर अमृत ज्ञान समझाकर सतलोक का वासी बनाया। त्रेता युग में परमात्मा कबीर मुनींद्र नाम से आए थे उस समय एक लीलामय तरीके से बंके नाम की एक प्यारी आत्मा को अपनी शरण में लिया,सत्य ज्ञान समझाया ओर पार किया। परमेश्वर कबीर साहिब जी चारों युगों में नामांतर करके शिशु रूप में प्रकट होते हैं और एक-एक शिष्य बनाते हैं जिससे कबीर पंथ का प्रचार होता है। सतयुग - सहते जीत्रेता - बंके जी द्वापर - चतुर्भुज जी कलियुग - धर्मदास जी कलयुग में कबीर परमेश्वर अपने वास्तविक नाम कबीर रूप में काशी नगरी में लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प पर अवतरित हुए। कलयुग में निसंतान दंपति नीरू और नीमा ने उनका पालन पोषण किया। परमेश्वर कबीर जी त्रेतायुग में ऋषि मुनीन्द्र जी के रूप में लीला करने आए तब हनुमान जी से मिले। तथा सतलोक के बारे में बताया हनुमानजी को विश्वास हुआ कि ये परमेश्वर हैं। सत्यलोक सुख का स्थान है। परमेश्वर मुनीन्द्र जी से दीक्षा ली। अपना जीवन धन्य किया। मुक्ति के अधिकारी हुए। द्वापर युग में कबीर परमेश्वर की दया से पांडवों का अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ। पांडवों की अश्वमेघ यज्ञ में अनेक ऋषि, महर्षि, मंडलेश्वर उपस्थित थे यहां तक कि भगवान कृष्ण भी उपस्थित थे फिर भी उनका शंख नहीं बजा। कबीर परमेश्वर ने सुदर्शन सुपच वाल्मीकि के रूप में शंख बजाया और पांडवों का यज्ञ संपन्न किया।गरीबदास जी महाराज की वाणी में इसका प्रमाण है गरीब ~सुपच रुप धरि आईया, सतगुरु पुरुष कबीर। तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनि जन भीर।। कबीर साहेब हीं पूर्ण परमात्मा हैं। लगभग एक दर्जन संतो ने इनकी गवाही ठोककर दी है।आएं देखें परमात्मा प्राप्त संतो की वाणी में क्या प्रमाण है। 1. सतगुरु पुरुष कबीर हैं, चारों युग प्रवान। झूठे गुरुवा मर गए, हो गए भूत मसान।। -गरीबदास जी अनंत कोटि ब्रम्हांड में, बंदीछोड़ कहाये। सो तो पुरष कबीर है, जननी जने न माय।। -गरीबदास जी हम सुल्तानी नानक तारे, दादु को उपदेश दिया। जाति जुलाहा भेद न पाया,कशी मे कबीर हुआ। -गरीबदास जी 2. और संत सब कूप हैं, केते झरिता नीर। दादू अगम अपार है, दरिया सत्य कबीर।। -दादु दयाल जी जिन मोको निज नाम दिया,सोई सतगुरु हमार।भ दादु दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजनहार।। -दादु दयाल जी 3. खालक आदम सिरजिआ आलम बडा कबीर॥ काइम दिइम कुदरती सिर पीरा दे पीर॥ सजदे करे खुदाई नू आलम बडा कबीर॥ -नानक जी यक अर्ज गुफ्तम पेश तोदर कून करतार। हक्का कबीर करीम तू बेऐब परवरदिगार।। -नानक जी नानक नीच कह विचार, धाणक रूप रहा करतार। -नानक जी 4. वाणी अरबो खरवो, ग्रन्थ कोटी हजार। करता पुरुष कबीर है, रहै नाभे विचार।। नाभादास जी 5. साहेब कबीर समर्थ है, आदी अन्त सर्व काल। ज्ञान गम्य से दे दीया, कहै रैदास दयाल॥ -रविदास जी 6. नौ नाथ चौरसी सिद्धा, इनका अन्धा ज्ञान। अविचल ज्ञान कबीर का, यो गति विरला जान॥ -गोरखनाथ जी 7. बाजा बाजा रहितका, परा नगरमे शोर। सतगुरू खसम कबीर है, नजर न आवै और॥ -धर्मदास जी 8. सन्त अनेक सन्सार मे, सतगुरू सत्य कबीर। जगजीवन आप कहत है, सुरती निरती के तीर॥ -जगजीवन जी 9. तुम स्वामी मै बाल बुद्धि, भर्म कर्म किये नाश। कहै रामानन्द निज हमरा दृढ़ विश्वास।। -रामानन्द जी 10 जपो रे मन साहिब नाम कबीर एक समय सतगुरू बंशी बजाई काल इन्द्री के तीर - मुलक दास जी 11. बंदीछोड़ हमारा नामम्, अजर अमर अस्थिर ठामम्।। -कबीर साहिब तारण तरण अभय पद दाता, मैं हूँ कबीर अविनाशी। -कबीर साहिब कबीर इस संसार को, समझांऊ के बार । पूंछ जो पकङे भेड़ की, उतरया चाहे पार ॥ -कबीर साहिब జ్ఞాన గంగా #कबीर
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Krishan das
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#kabir #कबीर #🙏गुरु महिमा😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #✨सोमवार स्पेशल राशिफल💫 पूज्य संत रामपाल जी महाराज जी के दिव्य सान्निध्य में अमर ग्रंथ साहेब का अखंड पाठ, शुद्ध देशी घी से निर्मित मोहन भंडारा, रक्तदान शिविर, दहेजमुक्त विवाह, और आध्यात्मिक प्रदर्शनी जैसे कार्यक्रम होंगे। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि सपरिवार इस पावन अवसर पर पधारें
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