sn vyas
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6 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डु के द्वारा मृगरूपधारी मुनि का वध तथा उनसे शाप की प्राप्ति...(दिन 348) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः । निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ।। २४ ।। नृपशिरोमणे ! तुम्हारा कर्तव्य तो यह है कि धर्म, अर्थ और कामसे हीन जो पापाचारी मनुष्य कठोरतापूर्ण कर्म करनेवाले हों, उन्हें दण्ड दो ।। २४ ।। किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं घ्नता । मुनिं मूलफलाहारं मृगवेषधरं नृप ।। २५ ।। वसमानमरण्येषु नित्यं शमपरायणम् । त्वयाहं हिंसितो यस्मात् तस्मात् त्वामप्यहं शपे ।। २६ ।। नरश्रेष्ठ ! मैं तो फल-मूलका आहार करनेवाला एक मुनि हूँ और मृग का रूप धारण करके शम-दमके पालन में तत्पर हो सदा जंगलों में ही निवास करता हूँ। मुझ निरपराध को मारकर यहाँ तुमने क्या लाभ उठाया? तुमने मेरी हत्या की है, इसलिये बदले में मैं भी तुम्हें शाप देता हूँ ।। २५-२६ ।। द्वयोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् । जीवितान्तकरो भाव एवमेवागमिष्यति ।। २७ ।। तुमने मैथुन-धर्ममें आसक्त दो स्त्री-पुरुषोंका निष्ठुरता पूर्वक वध किया है। तुम अजितेन्द्रिय एवं कामसे मोहित हो; अतः इसी प्रकार मैथुनमें आसक्त होनेपर जीवनका अन्त करनेवाली मृत्यु निश्चय ही तुमपर आक्रमण करेगी ।। २७ ।। अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः । व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ।। २८ ।। मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने । न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ।। २९ ।। मेरा नाम किंदम है। मैं तपस्यामें संलग्न रहनेवाला मुनि हूँ, अतः मनुष्योंमें- मानव-शरीरसे यह काम करनेमें मुझे लज्जाका अनुभव हो रहा था। इसीलिये मृग बनकर अपनी मृगीके साथ मैथुन कर रहा था। मैं प्रायः इसी रूपमें मृगोंके साथ घने वनमें विचरता रहता हूँ। तुम्हें मुझे मारनेसे ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी; क्योंकि तुम यह बात नहीं जानते थे (कि यह मुनि है) ।। २८-२९ ।। मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् । अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ।। ३० ।। परंतु जब मैं मृगरूप धारण करके कामसे मोहित था, उस अवस्थामें तुमने अत्यन्त क्रूरताके साथ मुझे मारा है; अतः मूढ़! तुम्हें अपने इस कर्मका ऐसा ही फल अवश्य मिलेगा ।। ३० ।। प्रियया सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः । त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ।। ३१ ।। तुम भी जब कामसे सर्वथा मोहित होकर अपनी प्यारी पत्नीके साथ समागम करने लगोगे, तब इस मेरी अवस्थामें ही यमलोक सिधारोगे ।। ३१ ।। अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया । प्रेतराजपुरं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् । भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वानुगमिष्यति ।। ३२ ।। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज ! अन्तकाल आने पर तुम जिस प्यारी पत्नी के साथ समागम करोगे, वही समस्त प्राणियों के लिये दुर्गम यमलोक में जाने पर भक्तिभाव से तुम्हारा अनुसरण करेगी ।। ३२ ।। वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वया। तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ।। ३३ ।। मैं सुखमें मग्न था, तथापि तुमने जिस प्रकार मुझे दुःखमें डाल दिया, उसी प्रकार तुम भी जब प्रेयसी पत्नीके संयोग-सुखका अनुभव करोगे, उसी समय तुम्हारे ऊपर दुःख टूट पड़ेगा ।। ३३ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात् स व्यमुच्यत । मृगः पाण्डुश्च दुःखार्तः क्षणेन समपद्यत ।। ३४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-यों कहकर वे मृगरूप-धारी मुनि अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और उनका देहान्त हो गया तथा राजा पाण्डु भी क्षणभरमें दुःखसे आतुर हो उठे ।। ३४ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुमृगशापे सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुको मृगका शाप नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️