sn vyas
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#कर्मफल तो #भोगना पड़ेगा #कर्म ⁉️प्रश्न:-यदि लालच इस जन्म में 100% खत्म हो गया, मोह खत्म हो गया 70%, ईर्ष्या द्वेष बैर सब पूरे खत्म हो गए। लेकिन भगवद प्राप्ति नहीं हुई तो अगला जब भी इंसान का जन्म मिलेगा तो ये जो लालच 100% खत्म हुआ ये खत्म रहेगा या वापिस आएगा??ऐसे ही मोह 70% खत्म होकर अगले जन्म में 30% पर ही काम करना होगा या शुरू से सब 100 मिलेगा??⁉️ 🧘देखिये ये लालच , ईर्ष्या द्वेष इत्यादि सब छोटे अवयव हैं । ये किसी के पुत्र हैं । इन सब की माता का नाम अविवेक है और पिता का नाम अहंकार है । तुलसीदास जी ने इसको एक में समेट दिया है कि - 🧘 मोह सकल व्याधिन कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु शूला ।। 🧑‍🍼मोह ही समस्त मानसिक व्याधियों का मूल है ।🧑‍🍼 ⁉️लेकिन यह मोह उपजता क्यों है ?? ⁉️ 🌷यह उपजता है अविवेक से । अविवेक क्या है ?? हम शरीर हैं । यही अविवेक है । जैसे ही हम यह मानते हैं कि हम शरीर हैं , ठीक उसी क्षण से उस शरीर से सम्बंधित विषयों को प्राप्त करने की लालसा पैदा हो जाती है । यही लालसा लालच पैदा करती है । यह हमें मिल जाये तो हमारे शरीर को यह लाभ मिल जाएगा । और फिर उस लाभ के लिए जी तोड़ मेहनत करना । जब उस लाभ की प्राप्ति में अवरोध आता है तो हमें क्रोध आता है । और उसकी पूर्ति पर और लालच बढ़ता है । उसकी प्राप्ति में जो बाधा बनता है , उससे हमें राग , द्वेष , ईर्ष्या इत्यादि जन्मते हैं । तो यह सब एक दूसरे से connected हैं । यह समझिये कि यह इतने interconnected हैं कि कहीं भी current रहेगा तो वह पूरे wire या fittings में जायेगा ही जायेगा । तो इनको अलग अलग नहीं समाप्त किया जा सकता । और इन सबका मूल कारण है , अहंकार । अहं भाव ।बअपने अस्तित्व की सत्ता का भाव । कर्तापन का भाव । तो यह कभी नहीं होगा कि हमारे अंदर से द्वेष तो समाप्त हो गया है लेकिन राग बाकी है । बिल्कुल नहीं । जितने प्रतिशत का राग होगा , उतने ही प्रतिशत का द्वेष होगा । जितने प्रतिशत का मोह होगा , उतने ही प्रतिशत का क्रोध होगा और लालच होगा । सब एक दूसरे के directly proportional हैं । एक बढ़ेगा तो दूसरा उसी अनुपात या ratio में बढ़ेगा या घटेगा । तो मूल में है अहंकार और कर्तापन का भाव । अब ये सब कभी खत्म नहीं हो सकते । दबाया जा सकता है इनको , अनुकूल परिस्थिति न दी जाए तो इनको दबाया जा सकता है लेकिन इनका नाश कभी नहीं होता । लेकिन कब तक ?? जब तक भगवदप्राप्ति न हो जाये । इसी दबाने को हम दूसरी भाषा में समझाने के लिए बोल देते हैं कि ये कम हो गए । ये नहीं कम हुए , इनका प्रभाव कम हुआ है । ये उसी तरह हैं । जैसे वर्षाकाल होते ही घास उग आती है , ठीक उसी तरह यह भी अनुकूल परिस्थिति मिलने पर फिर से प्रकट हो जाएंगे । तो जब यह कम होते हैं तो धीरे धीरे प्रकाश दिखने लगता है । जैसे सूर्य उगता है तो हम घर में भी रहें तब भी बिना सूर्य को साक्षात देखे , हम उसके प्रकाश का अनुभव कर सकते हैं । ठीक ऐसे ही जितना यह दबे रहेंगे उतना ही हमें उस दिव्य तत्त्व का आभास होने लगता है। लेकिन जिस दिन भगवदप्राप्ति होगी , उस दिन यह सब पँचक्लेश , प्रपंच , त्रिकर्म , त्रिदोष , पंचकोश सब नष्ट हो जाते हैं और हम सदा सदा को सदा पश्यन्ति सूरयः तद्विष्णोः परमं पदं की भाँति कृत कृत्य हो जाएंगे ।🌷 🤹अब रही बात कि अगर हम इन्हें नियंत्रण कर लेते हैं कुछ प्रतिशत तो क्या वह अगले जन्म में मिलेगा ?? तो हाँ , यह carry forward हो जाएगा आगे और अगले जन्म में आपको उतनी साधना या controlling power मिल जाएगी । इसीलिए 🤹 एक पिता के विपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन शील अचारा ।। कोउ पण्डित कोउ तापस ज्ञाता । कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ।। 👩‍❤️‍👩तो यह सब मिल जाता है । अगर शुरू से होना होता तो सब monotonous एक ही तरह होते । फिर साधना करने का कोई लाभ नहीं ।👩‍❤️‍👩 ⁉️पुनः प्रश्न:- इसका कितना परसेंट ये डिसाइड करेगा कि हमे अगला जन्म मनुष्य जन्म का ही प्राप्त होगा?? या जब भी अगला मनुष्य जन्म मिलेगा तब से काउंट होगा। या इसके प्रभाव से मनुष्य जन्म मिलेगा या हरि गुरु कृपा मात्र से या साधना में जितना समर्पण या शरणागति है मूल लक्ष्य के प्रति इसके आधार पर?⁉️ ✍️उत्तर:-मनुष्य जन्म का कोई विशेष criteria नहीं है । कईयों को भोगदण्ड भोगाने के लिए दिया जाता है और कोई ऐसा कर्म बन जाता है जो मनुष्य देह का कारण होता है । क्योंकि जो अपमान , तिरस्कार से दुःख की प्राप्ति मनुष्य जन्म में होती है , वह किसी अन्य देह में नहीं । कुत्ते के ऊपर थूक दें या 2 डंडे मार दें , तो उसे बस शरीर का कष्ट होगा । लेकिन मनुष्य तो सोच सोच कर ही मर जाता है । आप लोग देख लीजिए आप सब लोगों की लड़ाई सिर्फ सोच सोच कर होती है कि हमारा अपमान हो गया और कुछ नहीं । किसी ने किसी को शारीरिक कष्ट नहीं पहुँचाया होता है । लेकिन सोच सोच कर कि उसने हमें ऐसा कहा , वह हमें ऐसा समझता है , उसके सामने मेरा अपमान हो गया , आप देखते रहे जैसे द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था और आप भीष्म की तरह बैठे रहे , आदि आदि । तो यह सब सोचने के कारण ही होता है । किसी बात को अधिक हमने लेना शुरू कर दिया तो वह राई का पहाड़ बन जाता है । अरे लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं । तो भोगाने के लिए भी मनुष्य देह मिलता है । लेकिन एक कर्म ऐसा होता है जिसके कारण यह जन्म मिलता है । ऐसे समझिये कि कोयले की खुदाई करते करते एक truck भर कर कोयला निकला ,लेकिन उसमें एक हीरा भी निकल आया । तो यही हीरा कारण बनता है मनुष्य जन्म का । जिसका हीरा जितना बड़ा होगा , अच्छा होगा , cuttings अच्छी होंगी , उसे उतना ही अच्छा कुल , भाग्य , जन्म , शरीर , location, इत्यादि सब मिलता है और यह जान लें कि भगवद पथ पर चलने वालों को , जो कम से कम 8 घण्टे सही सही साधना को दे रहा है , उसे मनुष्य जन्म मिलना निश्चित है । जो जितना दिमागदार होगा , उसको विपरीत परिस्थिति में उतना ही कष्ट मिलेगा । कुत्ते को अधिक दिमाग नहीं तो उसे कम कष्ट । चींटी को उससे कम। तो उसे कम कष्ट चाहे आप उसे घर से बाहर निकाल दें , या खाट पर से उठाकर पटक दें । सब वही बात है । शरणागति तभी बढ़ती है जब यह सब कम होने लगते हैं , अहंकार का दमन होने लगता है ।⁉️पुनः प्रश्न:- अहंकार और करतापन का भाव कभी खत्म नहीं होता भगवद प्राप्ति से पहले और अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होते ही ये अपने सर को उठा लेते हैं, तो ऐसी परस्थिति में क्या उचित है .....अगर लग रहा है कि अहंकार या कर्तापन आ रहा है तो उस जगह से भाग जाएं या उसी में रहकर परीक्षा दी जाए और सुधारा जाए? भाग जाए का मतलब ऐसी परिस्थितियों को ही हमेशा पैदा होते ही किनारा कर दें?⁉️ ✍️उत्तर:-भागना कोई हल है ही नहीं । कहीं भी भागेंगे मन तो आपके साथ ही जायेगा । परिस्थितियाँ तो जड़ हैं , वह कुछ नहीं करती । करता तो सब कुछ ये मन है न । तो भाग कर जाना कहाँ ?? भले हम 10km अंदर जमीन के गुफा में ही क्यों न हों , मन तो साथ रहेगा ही न , वह जीने नहीं देगा । मन को ही सुधारना है , सब परिस्थिति अनुकूल हो जाएगी । परिस्थिति को तो हम ऐसे ही दोष दे देते हैं , लेकिन सबका दोषी मन ही होता है । तो कर्ताभाव या कर्तापन हटाने के लिए बस एक उपाय करना है । वह क्या है ?? ✍️ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।। 🛐तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो ।।किसे ? भगवान को अर्पण करना है और क्या करना है ?? 🛐 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । और क्या करना है ?? मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।। और ?? मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिम् निवेशय । बुद्धि मुझमें समर्पित कर के चलो । और क्या?? सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान । सभी कर्मफलों का त्याग करना है । और ??? अभ्यासेSप्यसमर्थोSसि मत्कर्म परमो भव । अभ्यास करो कि सभी कर्म उन्हीं को समर्पित करो । 🕉️बस जो कुछ करो , उन्हें ही समर्पित करना है और उनके निमित्त ही करना है । मन से कहीं नहीं भाग सकते ।🕉️