Deepak Kumar
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एक शांत शाम थी, वृंदावन की गलियों में हल्की-हल्की हवा चल रही थी। यमुना किनारे कल-कल बह रही थी, और ग्वाल-बालों की हँसी दूर से सुनाई दे रही थी। पेड़ों पर बैठे तोते और कोयलें मीठे स्वर में गा रहे थे, मानो आज का दिन कुछ खास हो। उसी वृंदावन में राधा बैठी थीं, अपने मन में एक ही नाम था – कान्हा। राधा ने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा, “कान्हा… तुम सच में मुझे याद करते हो, या बस बांसुरी को ही प्यार करते हो?” यहीं दूसरी ओर नंदगाँव में, कान्हा अपनी बांसुरी हाथ में लिए बैठे थे। उनकी आँखों में वही शरारत, लेकिन दिल में राधा का ही ध्यान। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर बांसुरी से कहा, “आज की धुन, सिर्फ राधा के लिए होगी।” जैसे ही बांसुरी की मधुर तान पूरे वृंदावन में गूँजी, राधा का दिल धक से रह गया। वो जानती थीं – यह आवाज सिर्फ एक ही की हो सकती है – उनके कान्हा की। उनके पाँव खुद-ब-खुद चल पड़े, ना उन्होंने ये सोचा कि कौन क्या कहेगा, ना ये कि रास्ता कितना दूर है। बस एक ही आवाज कानों में गूँज रही थी – बांसुरी की। यमुना किनारे, फूलों से सजे कुंज में कृष्ण खड़े थे। सिर पर मोरपंख, पीताम्बर, चेहरे पर मृदु मुस्कान, हाथ में बांसुरी। राधा वहाँ पहुँचीं। एक पल के लिए पूरी सृष्टि जैसे रुक गई। हवा थम गई, पत्तियाँ स्थिर हो गईं, पंछी चुप हो गए। श्रीकृष्ण ने बांसुरी होठों से हटाई और राधा की तरफ देखा। उनकी आँखों में वही अनंत प्रेम, जो शब्दों से परे था। कृष्ण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “राधे, तुम आ ही गईं। मैं जानता था, मेरी बांसुरी की पुकार तुम कभी ठुकरा नहीं सकतीं।” राधा ने थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “तुम्हें पूरा वृंदावन प्यारा है, सबसे तुम्हें प्रेम है… पर क्या मैं तुम्हारे लिए सच में खास हूँ, कान्हा?” कृष्ण ने धीरे से कहा, “राधे, दुनिया मुझे भगवान कहती है, पर मेरा हृदय जानता है – मैं पूरा तब हूँ, जब तुम हो। मैं ‘कृष्ण’ हूँ, पर मेरे नाम की असली पूर्णता तो ‘राधा-कृष्ण’ में है।” राधा ने फिर पूछा, “पर तुम्हारा प्रेम तो सबके लिए है, गोकुल के लिए, वृंदावन के लिए, सब जीवों के लिए… तो मैं अलग कैसे हुई?” कृष्ण ने पास आकर कहा, “मेरा प्रेम सबके लिए है, ये सत्य है। पर तुम्हारे लिए मेरा प्रेम… स्वार्थ से परे, इच्छा से परे, मांग से परे – सिर्फ भाव है। तुम मुझमें समाई हो, और मैं तुममें। तुम और मैं – दो शरीर नहीं, एक ही आत्मा की दो लहरें हैं।” राधा की आँखों में आँसू आ गए, पर ये आँसू दर्द के नहीं, प्रेम के थे। कृष्ण ने उनकी आँखों से आँसू पोंछते हुए कहा, “राधे, लोग अक्सर पूछते हैं – हमने विवाह क्यों नहीं किया। पर वे ये नहीं समझते कि हमारा रिश्ता किसी बंधन से ऊपर है। हमारा प्रेम ऐसा है, जो किसी नाम, किसी रिश्ते, किसी कागज़ का मोहताज नहीं। हमारा प्रेम भक्ति है, समर्पण है, मिलन से ज्यादा विरह की गहराई है।” राधा ने धीरे से कहा, “कान्हा, अगर एक दिन तुम मुझे छोड़ कर चले जाओ तो?” कृष्ण ने आसमान की ओर देखा, “जिस प्रेम में ‘मैं’ और ‘तुम’ नहीं बचते, वहाँ छोड़ना और मिलना दोनों ही मायने नहीं रखते। तुम्हारी हर साँस में मैं हूँ, और मेरी हर धड़कन में तुम।” राधा ने पूछा, “तो लोग हमें क्यों याद करेंगे, कान्हा?” कृष्ण मुस्कुराए, “क्योंकि हमारा प्रेम उन्हें सिखाएगा – कि सच्चा प्यार सिर्फ पाना नहीं, बल्कि बिना शर्त प्रेम करना है। जब इंसान बिना स्वार्थ के प्रेम करेगा, तब वो हमारे प्रेम का थोड़ा अंश महसूस करेगा।” वृंदावन में धीरे-धीरे रात गहराने लगी। चाँद आसमान में चढ़ आया, और तारों ने झिलमिलाना शुरू किया। कृष्ण ने फिर से बांसुरी उठाई, पर इस बार जो धुन बज रही थी, उसमें सिर्फ राधा का भाव था। राधा ने आँखें बंद कर लीं। उन्हें लगा जैसे पूरी सृष्टि गायब हो गई है, बस वो और उनका कान्हा हैं। उस पल वे दोनों चुप थे, पर उनकी आत्माएँ एक-दूसरे से बात कर रही थीं। कृष्ण ने मन ही मन कहा, “राधे, अगर दुनिया मुझमें भगवान देखे, तो वो तुममें मेरा सबसे पवित्र प्रेम देखे।” राधा ने मन ही मन उत्तर दिया, “कान्हा, अगर लोग मुझमें प्रेमिका देखें, तो वो तुममें मेरा आराध्य, मेरा सर्वस्व देखें।” समय बीतता गया, लीला आगे बढ़ती रही। कृष्ण ने द्वारका की राह पकड़ी, राधा वृंदावन में ही रहीं, पर उनका प्रेम कभी नहीं टूटा। लोग कहते हैं – कृष्ण द्वारका में थे, राधा वृंदावन में, पर सच्चाई ये है कि जितने कदम कृष्ण ने दूर द्वारका की ओर बढ़ाए, उतने ही गहरे वे राधा के हृदय में उतरते गए। आज भी जब कोई प्रेम में सच्चाई से, निस्वार्थ भाव से किसी से प्रेम करता है, तो लोग कहते हैं – “तुम्हारा प्यार तो राधा-कृष्ण जैसा लगता है।” क्योंकि राधा-कृष्ण का प्रेम सिर्फ कहानी नहीं, एक दिव्य अनुभव है – जहाँ प्यार, पूजा बन जाता है, और प्रेमी, प्रभु बन जाता है। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇