गुरु अंगद देव ज्योति ज्योत
श्री गुरु अंगद देव जी महाराज सिखों के दूसरे गुरु थे। गुरु नानक देव जी ने इन्हीं को अपना उत्तराधिकारी बनाकर गुरु गद्दी सौपी थी। इनका मूल नाम लहणा था। जिसको बदलकर गुरू नानक देव जी ने इन्हें अंगद देव नाम दिया था। एक दिन गुरु नानक देव जी प्रभु के रंग में रंगे हुए लहणा जी से कहने लगे कि आप खडूर चले जाइए क्योंकि अब हमें सचखंड स्थान पर जाना है। गुरु जी के वचन मानकर भाई लहणा जी के मन पर गहरा असर हुआ और आप गुरु नानक जी के वियोग में खडूर साहिब में वापस लौटकर अपनी बुआ जी माई भराई के मकान में बैठकर समाधिलीन हो गए और इस प्रकार संसार से किनारा सा कर गए। जब गुरु नानक देव जी ज्योति ज्योत समा गए तो संगत द्वितीय नानक की खोज में उदास सी हो गई तो बाबा बुड्ढा जी साहिब से मार्ग दर्शन की प्रार्थना करने लगी। बाबा बुड्ढा जी बड़े बुद्धिमान थे और जानते थे कि गुरु अंगद देव जी, गुरु नानक पातशाह की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले नहीं है। सो आप सारी संगत को साथ लेकर खडूर साहिब पहुंचे। माई भराई के मकान पर आकर गुरु नानक देव जी महाराज के ज्योतिलीन होने का समाचार सुनाया तथा प्रार्थना की कि हे दीनदयाल महाराज जी, संगत आपके दर्शन के लिए व्याकुल है। आप नानक पातशाह का उपदेश देकर संगत को निहाल करे। बाहर दीवान सजाया गया और दर्शन देकर गुरु साहिब के प्रकट होने का समाचार मिलता गया, चारों ओर से संगत दर्शनों के लिए खडूर साहिब में आने लगी और नगर में मेले के जैसा माहौल बनने लगा। सारे सिख जगत में खुशी की एक लहर सी दौड़ गई। खडूर साहिब का एक चौधरी था, वह अहंकार का सताया हुआ तथा शराब का सेवन करने वाला था। वह गुरु जी से आकर कहने लगा कि आप अनेकों के दुख दूर करते है, मांनू तो तब जब आप मेरी शराब छुड़वा देवे मेरा मिर्गी का दौरा दूर कर दे?। महाराज जी ने कृपा दृष्टि करते हुए कहा तेरा दुख दूर हो जायेगा यदि तुम शराब पीना छोड़ दोगे। वह व्यक्ति सत्य वचन कहकर चला आया। गुरु साहिब की कृपा से उसकी मिर्गी की बिमारी दूर हो गई। एक दिन उसने फिर से शराब पी ली और अपने मकान की ऊपर वाली छत पर चढ़कर हुंकारने लगा मैने तो शराब नहीं छोड़ी देख लूंगा मेरा क्या बिगड़ जाएगा। कुछ ही देर बाद शराब के नशे में धुत वह लड़खड़ा कर छत से नीचे गली में आ गिरा और सदा की नींद सो गया।अमरदास जी गुरु अंगद देव जी की बहुत दिल लगाकर सेवा करते थे। आधी रात उठकर खडूर साहिब से ब्यास नदी से आपके स्नान के लिए जल लेकर आते थे। एक रात बहुत जोर से वर्षा हो रही थी, तथा आंधी चल रही थी। आप पानी से भरी गगरिया उठाये आ रहे थे कि अंधेरा होने के कारण आपका पांव एक जुलाहे की खडडी में उलझ गया और आप गिर पड़े, परंतु पानी की गागर को कंधे पर संभाले रखा।जुलाहे ने आपसे दुर्वचन कहे और उसकी स्त्री ने कहा इस समय अमरू निथावें के सिवाय बाहर कोई नहीं हो सकता। जब गुरु अंगद देव जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने वचन दिया। अमरदास निथवां नहीं वह तो निथावों की थां है। अर्थात जिनका कोई स्थान नही उनका आश्रय है। गुरु जी ने आपको गोइंदवाल साहिब जाकर संगतों को गुरवाणी प्रचार करने तथा नया नगर बसाने की आज्ञा दी। गोइंदवाल के निर्माण कार्य की प्रगति देखकर गुरु अंगद देव जी प्रसन्नहोते और आप पर अपनी कृपा वर्षा करते।
श्री गुरू अमरदास जी महाराज को गुरु गद्दी सौपकर गुरु अंगददेव जी ज्योति ज्योत में समा गये। गुरु अंगद देव जी ने मात्र 63 श्लोकों की रचना की जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में वारों के साथ लिखे हुए सुशोभित हो रहे है।
#शत शत नमन