#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 331)
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वैशम्पायन उवाच
(धृतराष्ट्र च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।) तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर-इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र- इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ।। १ ।।
ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ।। २ ।।
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ।। २ ।।
वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ३ ।।
घोड़े हाथी आदि वाहन हृष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ।। ३ ।।
वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ।। ४ ।।
सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे। शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ।। ४ ।।
नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः । प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ।। ५ ।।
कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था। राष्ट्र के विभिन्न प्रान्तों में सत्ययुग छा रहा था ।। ५ ।।
धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः ।
अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ।। ६ ।।
उस समय की प्रजा सत्य-व्रत के पालन में तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्म में लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मों में संलग्न रहकर एक-दूसरे को प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथ पर बढ़ती जाती थी ।। ६ ।।
मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः।
अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ।। ७ ।।
सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ।। ७ ।।
तन्महोदधिवत् पूर्ण नगरं वै व्यरोचत ।
द्वारतोरणनिर्यू हैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ।। ८ ।।
समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ।। ८ ।।
प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ।। ९ ।।
सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ।। ९ ।।
उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा।
विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ।। १० ।।
उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ।। १० ।।
नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः ।
तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ।। ११ ।।
कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ।। ११ ।।
कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्र सदोत्सवाः ।। १२ ।।
उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ।। १२ ।।
भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते ।
बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ।। १३ ।।
जनमेजय ! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ।। १३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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