#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 309)
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तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः । शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ।। ३० ।।
यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ।। ३० ।।
दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणी तं कुमारमलंकृतम् ।। ३१ ।।
तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ।। ३१ ।।
अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् । दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ।। ३२ ।।
गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ।। ३२ ।।
गङ्गोवाच
यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः । स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ।। ३३ ।।
गंगाजीने कहा-महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसे प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह ! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तम है ।। ३३ ।।
गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ।। ३४ ।।
राजन! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ ! स्वामिन् ! इसे घर ले जाइये ।। ३४ ।।
वेदानधिजगे साङ्गान् वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ।। ३५ ।।
आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ।। ३५ ।।
सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ।। ३६ ।।
भारत ! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ।। ३६ ।।
तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।। ३७ ।।
तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्ग महात्मनि ।
ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। ३८ ।।
यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् । महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ।। ३९ ।।
मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ।
इसी प्रकार अंगिरा के पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्याको जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ।। ३७-३९३
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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