sn vyas
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29 days ago
#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣6️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुरशीतितमोऽध्यायः ययाति का अपने पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेने के लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करने पर उन्हें शाप देना, फिर अपने पुत्र पूरु को जरावस्था देकर उनकी युवावस्था लेना तथा उन्हें वर प्रदान करना...(दिन 268) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ययातिरुवाच यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । जरादोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात् त्वं प्रतिपत्स्यसे ।। २५ ।। प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव । अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ।। २६ ।। ययातिने कहा- अनो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहा है और बुढ़ापेके दोष बतला रहा है, अतः तू वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करेगा और तेरी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तू भी बूढ़े-जैसा होकर अग्निहोत्रका त्याग कर देगा ।। २५-२६ ।। ययातिरुवाच पूरो त्वं मे प्रियः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि । जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ।। २७ ।। ययातिने [पूरुसे] कहा- पूरो! तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे। तात ! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया; सब अंगोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये। बुढ़ापाके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं ।। २७ ।। काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने । पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । कंचित् कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव ।। २८ ।। पूर्ण वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ।। २९ ।। कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरो ! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा ।। २८-२९ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा । यथाऽऽत्थ मां महाराज तत् करिष्यामि ते वचः ।। ३० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा- 'महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा ।। ३० ।। (गुरोर्वे वचनं पुण्यं स्वर्ग्यमायुष्करं नृणाम् । गुरुप्रसादात् त्रैलोक्यमन्वशासच्छतक्रतुः ।। गुरोरनुमतिं प्राप्य सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।) 'गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन मनुष्योंके लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करनेवाला है। गुरुके ही प्रसादसे इन्द्रने तीनों लोकोंका शासन किया है। गुरुस्वरूप पिताकी अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है। प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मानं जरया सह । गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान् यथेप्सितान् ।। ३१ ।। 'राजन् ! मैं बुढ़ापे के साथ आपका दोष ग्रहण कर लूँगा। आप मुझसे जवानी ले लें और इच्छानुसार विषयोंका उपभोग करें ।। ३१ ।। जरयाहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव । यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथाऽऽत्थ माम् ।। ३२ ।। 'मैं वृद्धावस्थासे आच्छादित हो आपकी आयु एवं रूप धारण करके रहूँगा और आपको जवानी देकर आप मेरे लिये जो आज्ञा देंगे, उसका पालन करूँगा' ।। ३२ ।। ययातिरुवाच पूरो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते । सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ।। ३३ ।। ययाति बोले-वत्स! पूरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देता हूँ - 'तुम्हारे राज्यमें सारी प्रजा समस्त कामनाओंसे सम्पन्न होगी' ।। ३३ ।। एवमुक्त्वा ययातिस्तु स्मृत्वा काव्यं महातपाः । संक्रामयामास जरां तदा पूरी महात्मनि ।। ३४ ।। ऐसा कहकर महातपस्वी ययातिने शुक्राचार्यका स्मरण किया और अपनी वृद्धावस्था महात्मा पूरुको देकर उनकी युवावस्था ले ली ।। ३४ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने चतुरशीतितमोऽध्यायः।। ८४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत