जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १५☀️ पृष्ठ १६☀️
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू ।
कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥१॥
[हनुमान् जी बोले-] श्रीरामचन्द्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षों के नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान ॥१॥
कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा ।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हितरहे करत तेइपीरा।उरग स्वाससम त्रिबिधसमीरा॥२॥
और कमलों के वन भालों के वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गयी है ॥२॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥३॥
मन का दुःख कह डालने से भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ॥३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तनसुधि नहिं तेही॥४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गयीं। उन्हें शरीर की सुध न रही ॥४॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उरआनहु रघुपति प्रभुताई।सुनि ममबचन तजहु कदराई॥५॥
हनुमान् जी ने कहा- हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्रीरामजी का स्मरण करो। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुन कर कायरता छोड़ दो ॥५॥
दो०- निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥१५॥
राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्रीरघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो ॥१५॥
#सीताराम भजन