sn vyas
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#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) नवनवतितमोऽध्यायः महर्षि वसिष्ठ द्वारा वसुओं को शाप प्राप्त होने की कथा...(दिन 304) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शान्तनुरुवाच आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् । यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ।। १ ।। शान्तनुने पूछा-देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपवके शापसे उन सबको मनुष्य-योनिमें आना पड़ा ।। १ ।। अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् । यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ।। २ ।। और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोक में निवास करेगा ।। २ ।। मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ।। ३ ।। ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम्। जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्य लोक में उत्पन्न हुए? यह सब बात मुझे बताओ ।। ३ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् । भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- नरश्रेष्ठ जनमेजय ! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकार पूछनेपर जहुपुत्री गंगादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ।। ४ ।। गङ्गोवाच यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम । वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ।। ५ ।। गंगा बोलीं- भरतश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही 'आपव' नामसे विख्यात हैं ।। ५ ।। तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् । मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ।। ६ ।। गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है। सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ।। ६ ।। स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम । वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ।। ७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ।। ७ ।। दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता। गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ।। ८ ।। महाराज ! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ।। ८ ।। अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ।। ९ ।। वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ।। ९ ।। सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ।। १० ।। वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ।। १० ।। अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ। पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ।। ११ ।। भरतश्रेष्ठ ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ।। ११ ।। ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ।। १२ ।। वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ।। १२ ।। तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ।। १३ ।। इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल ! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ।। १३ ।। नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ।। १४ ।। राजेन्द्र ! सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवालों में उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्ति से वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ।। १४ ।। द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण । आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभाम् ।। १५ ।। उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ।। १६ ।। दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन । द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ।। १७ ।। उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान् वदन् । एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा ।। १८ ।। ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् । अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ।। १९ ।। दशवर्षसहस्राणि स जीवेत् स्थिरयौवनः । एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ।। २० ।। तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ।। २१ ।। वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले महाराज ! उस देवीने द्यो नामक वसुको वह शुभ गाय दिखायी, जो भलीभाँति हृष्ट-पुष्ट थी। दूधसे भरे हुए उसके थन बड़े सुन्दर थे, पूँछ और खुर भी बहुत अच्छे थे। वह सुन्दर गाय सभी सद्‌गुणोंसे सम्पन्न और सर्वोत्तम शील-स्वभावसे युक्त थी। पूरुवंशका आनन्द बढ़ानेवाली सम्राट् ! इस प्रकार पूर्वकालमें वसुका आनन्द बढ़ानेवाली देवीने अपने पति वसुको ऐसे सद्‌गुणोंवाली गौका दर्शन कराया। गजराजके समान पराक्रमी महाराज! द्योने उस गायको देखते ही उसके रूप और गुणोंका वर्णन करते हुए अपनी पत्नीसे कहा- 'यह कजरारे नेत्रोंवाली उत्तम गौ दिव्य है। वरारोहे! यह उन वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठकी गाय है, जिनका यह उत्तम तपोवन है। सुमध्यमे ! जो मनुष्य इसका स्वादिष्ट दूध पी लेगा, वह दस हजार वर्षोंतक जीवित रहेगा और उतने समयतक उसकी युवावस्था स्थिर रहेगी।' नृपश्रेष्ठ ! सुन्दर कटि-प्रदेश और निर्दोष अंगोंवाली वह देवी यह बात सुनकर अपने तेजस्वी पतिसे बोली- 'प्राणनाथ! मनुष्यलोकमें एक राजकुमारी मेरी सखी है' ।। १५-२१ ।। नाम्ना जितवती नाम रूपयौवनशालिनी। उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसंधस्य धीमतः ।। २२ ।। दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसम्पदा । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ।। २३ ।। 'उसका नाम है जितवती। वह सुन्दर रूप और युवावस्थासे सुशोभित है। सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् राजर्षि उशीनरकी पुत्री है। रूपसम्पत्तिकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें उसकी बड़ी ख्याति है। महाभाग ! उसीके लिये बछड़ेसहित यह गाय लेनेकी मेरी बड़ी इच्छा है ।। २२-२३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत