#महाभारत
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना केवल एक युद्ध-कथा के रूप में नहीं की, बल्कि जीवन के शाश्वत मूल्यों—धर्म, कर्तव्य, नीति और अध्यात्म—को स्थापित करने के लिए की।
इतने विराट ग्रंथ की रचना के बाद भी वे संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उसमें भगवान-तत्व केंद्र में नहीं था।
नारद के उपदेश से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की, जिसमें भगवान ही केंद्र में हैं।
कलियुग की दुर्बलताओं को जानते हुए उन्होंने वेदों को चार भागों—
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—में विभाजित किया, ताकि सामान्य जन भी उन्हें समझ सकें।
महाभारत का हृदय श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, ज्ञान और भक्ति का उपदेश दिया।
वेदव्यास का अंतिम संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
दूसरों को पीड़ा न देना और उनकी सेवा करना ही धर्म है।
जो व्यवहार हमें स्वयं को पसंद नहीं, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
भाषा-दृष्टि से सँवरा हुआ अंश (उद्धरण-योग्य)
“धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है,
फिर भी मनुष्य उसका आचरण क्यों नहीं करता?
जो अपने कल्याण की इच्छा रखता है,
उसे भय या लोभ के कारण धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।”