#एपस्टिन फाइल्स:नवा खुलासा #मोदी है ....... खून में ही व्यापार है #✋राहुल गांधी 🔵
मंत्री ने इस्तीफ़ा नहीं, सफ़ाई दी!
दुनिया के कई देशों में जेफरी एपस्टीन जैसे यौन अपराधी से रिश्ते सामने आते ही मंत्री अपनी कुर्सी छोड़ रहें हैं। अभी तक क़रीब डेढ़ दर्जन से ज़्यादा लोगों ने इस्तीफ़े दिए हैं क्योंकि शर्म, नैतिकता और जवाबदेही अब भी कुछ देशों में ज़िंदा हैं।
लेकिन भारत में तस्वीर कुछ अलग है। यहाँ इस्तीफ़ा कोई नैतिक कदम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वस्तु बन चुका है। जो संग्रहालय में रख दी गई है, उसे देखने की अनुमति नहीं है।
मोदी सरकार के एक कैबिनेट मंत्री का नाम एपस्टीन से मिलने वालों में आया तो न कुर्सी हिली, न रीढ़। मंत्री ने इस्तीफ़ा नहीं दिया, सफ़ाई दी। और सफ़ाई भी ऐसी कि लगे कि गलती नहीं, कोई बड़ी उपलब्धि हो। जैसे कह रहे हों कि “मिलना तो पड़ेगा ही, हम अंतरराष्ट्रीय लोग हैं।”
यहाँ जवाबदेही अब शब्दकोश में नहीं, सिर्फ़ टीवी डिबेट में पाई जाती है। सवाल पूछो तो देशद्रोह, जवाब मांगो तो एजेंडा, और इस्तीफ़े की बात करो तो कहा जाता है कि “इतना भी क्या नैतिक हो जाना?”
चंदभक्तों की दलील तो और भी ऐतिहासिक है कि “कुछ तो दे रहे हैं, सफ़ाई ही सही। अगर वो भी नहीं देंगे तो क्या उखाड़ लोगे?” यानी अब लोकतंत्र में नागरिक का अधिकार सवाल पूछना नहीं, उखाड़ने की क्षमता पर निर्भर करता है।
पहले नेता छोटी सी गलती पर इस्तीफ़ा देते थे। फिर गलती पर सफ़ाई देने लगे। लेकिन अब हाल यह है कि सफ़ाई न देना भी विशेषाधिकार बन गया है। इसलिए पहली बार किसी मंत्री के सफ़ाई देने पर चर्चा हो रही है।
दरअसल देश में इस्तीफ़ा अब राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, विदेशी संस्कृति घोषित कर दी गई है। और नैतिकता? वो ‘मेक इन इंडिया’ की सूची में कभी थी ही नहीं।
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#कौशिक-राज़... ✍️