#श्री हरि विष्णु
।। भगवान विष्णु की स्तुति ।।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
सरल अर्थ -
जिनका स्वरूप शांत है , जो शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है और जो देवताओं के भी देव हैं ;
जो पूरे विश्व को धारण किए हुए हैं, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, जो मेघ के समान नील वर्णवाले हैं और जिनके अंग शुभ हैं ;
जो भगवती लक्ष्मी जी के पति हैं , जिनके नेत्र कमल के सदृश हैं और जिनका ध्यान निरंतर योगी करते हैं ;
उन भगवान विष्णु की मैं वन्दना करता हूं , जो सभी भय को हरनेवाले तथा सभी लोकों के स्वामी हैं।
निहितार्थ -
उपर्युक्त श्लोक में परात्पर भगवान विष्णु के सगुण एवं साकार दृष्टि से अनंत ऐश्वर्यशाली रूप को दर्शाया गया है।
शान्ताकारं भुजगशयनं-
इससे हमें भगवान विष्णु के असाधारण व्यक्तित्व का पता चलता है। वे कितने ओजस्विता के स्वामी होंगे , जो कराल काल के प्रतीकभूत सर्प पर शयन करते हुए भी अपने को शान्त बनाए रखते हैं। प्रतिकूल परिस्थिति में भी शांत रहने वाला व्यक्तित्व ही विनाश के कगार पर खड़े विश्व को बचाने में सफल होता है। इस त्रिगुणात्मक संसार में रहकर भी हमें भगवान विष्णु की भांति निर्विकार रहना चाहिए - भक्तों के लिए यह संदेश भी इसमें अंतर्निहित है।
पद्मनाभं सुरेशं -
पद्मनाभं का अर्थ है - कमल को नाभि में धारण करनेवाले और सुरेशं का अर्थ है - सभी सुरों के ईश अर्थात् संपूर्ण देवताओं के स्वामी।
श्री विष्णु की नाभि से प्रकट कमल जगत-स्रष्टा श्री ब्रह्मा जी का उद्गम-स्थान होने के कारण भगवान विष्णु की उच्च अधिष्ठानीयता का परिचायक है।
विश्वाधारं गगनसदृशं -
श्री विष्णु विश्व के आधार हैं। इस चराचरात्मक सृष्टि के आश्रय हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सभी वस्तुओं में श्री विष्णु और श्री विष्णु में सभी वस्तुओं (जड़-चेतन) का अंतर्भाव है। तथापि इस वैशिष्ट्य से युक्त होने पर भी वे गगनवत् यानी आकाश के समान सर्वव्यापी हैं।
मेघवर्णं शुभाङ्गम् -
भगवान विष्णु का वर्ण रङ्ग मेघ के समान श्यामल है। श्री विष्णु के अंग अतीव मनोहर शोभन हैं। नील सागर में श्यामल रंग में भगवान श्री विष्णु के अंग सुशोभित हो रहे हैं।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं -
लक्ष्मीकांत शब्द भगवती लक्ष्मी के पति का द्योतक है। लक्ष्मी धन-संपदा , श्री , शोभा आदि का प्रतीक है। भगवान विष्णु लक्ष्मी अर्थात् वैभव के स्वामी हैं।
भगवान विष्णु के नयन को तो हम सब ने नहीं देखा है, किंतु कमल पुष्प को देखा है। अतः यहां तुलना की गई है कि जिस प्रकार कमल कोमल , मनोरम एवं आकषर्णीय होता है, ठीक इसी प्रकार भगवान के नयन भी कमलवत् हैं।
योगिभि: ध्यानगम्यं -
हम सभी जानते हैं मन कभी भी निराकार सत्ता में एकाग्र नहीं हो सकता। मन का आहार होता है - रूप (आकार) एवं वर्ण (रंग)। भगवान विष्णु के इस परम सौंदर्यपूर्ण छटाकरी रंग से सुशोभित अंगों का ध्यान सहज ही योगियो के अंतःकरण में समाहित हो जाता है।
भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् -
भौतिक सागर को पार करना ही अति कठिन है। संसार सागर को अपने बलबूते पर करना तो काफी दुष्कर है। भगवान विष्णु संसाररूपी सागर को पार करने में सक्षम हैं।उनकी शरण में जाने से संसाररूपी सागर का भय समाप्त हो जाता है। इसका कारण यह है कि वे भक्तों के भय (दुःख एवं कष्टों) का हरण करनेवाले हैं।
हम सभी इस भौतिक जगत में अनाथ हैं। भगवान विष्णु अखिल विश्व के एकमात्र नाथ (स्वामी) हैं।
वन्दे विष्णुं -
भगवान विष्णु के शरण में जाने के भाव को " वन्दे विष्णुं " से प्रकट किया गया है। इसका आशय यह है कि मैं उन परात्पर भगवान विष्णु के चरणों में शीश झुकाता हूं।
।। भगवती-लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की जय ।।