#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 324)
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मातापित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे ।। ३१ ।।
तेषां पिता यथा स्वामी तथा माता न संशयः ।
विधानविहितः सत्यं यथा मे प्रथमः सुतः ।। ३२ ।।
विचित्रवीर्यो ब्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः ।
यथैव पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः ।। ३३ ।।
भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे।
अयं शान्तनवः सत्यं पालयन् सत्यविक्रमः ।। ३४ ।।
'विद्वन्! माता और पिता दोनोंसे पुत्रोंका जन्म होता है, अतः उनपर दोनोंका समान अधिकार है। जैसे पिता पुत्रोंका स्वामी है, उसी प्रकार माता भी है। इसमें संदेह नहीं है। ब्रह्मर्षे! विधाताके विधान या मेरे पूर्वजन्मोंके पुण्यसे जिस प्रकार तुम मेरे प्रथम पुत्र हो, उसी प्रकार विचित्रवीर्य मेरा सबसे छोटा पुत्र था। जैसे एक पिताके नाते भीष्म उसके भाई हैं, उसी प्रकार एक माताके नाते तुम भी विचित्रवीर्यके भाई ही हो। बेटा! मेरी तो ऐसी ही मान्यता है; फिर तुम जैसा समझो। ये सत्यपराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म सत्यका पालन कर रहे हैं ।। ३१-३४ ।।
बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने । स त्वं व्यपेक्षया भ्रातुः संतानाय कुलस्य च ।। ३५ ।।
भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ । अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च ।। ३६ ।।
आनृशंस्याच्च यद् ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि । यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे ।। ३७ ।।
रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च धर्मतः । तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक ।। ३८ ।।
अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य च ।
'अनघ ! संतानोत्पादन तथा राज्य शासन करनेका इनका विचार नहीं है; अतः तुम अपने भाईके पारलौकिक हितका विचार करके तथा कुलकी संतानपरम्पराकी रक्षाके लिये भीष्मके अनुरोध और मेरी आज्ञासे सब प्राणियोंपर दया करके उनकी रक्षा करनेके उद्देश्यसे और अपने अन्तःकरणकी कोमल वृत्तिको देखते हुए मैं जो कुछ कहूँ, उसे सुनकर उसका पालन करो। तुम्हारे छोटे भाईकी पत्नियाँ देवकन्याओंके समान सुन्दर रूप तथा युवावस्थासे सम्पन्न हैं। उनके मनमें धर्मतः पुत्र पानेकी कामना है। पुत्र ! तुम इसके लिये समर्थ हो, अतः उन दोनोंके गर्भसे ऐसी संतानोंको जन्म दो, जो इस कुलपरम्पराकी रक्षा तथा वृद्धिके लिये सर्वथा सुयोग्य हों' ।। ३५-३८३ ।।
व्यास उवाच
वेत्थ धर्म सत्यवति परं चापरमेव च ।। ३९ ।।
तथा तव महाप्राज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः । तस्मादहं त्वन्नियोगाद् धर्ममुद्दिश्य कारणम् ।। ४० ।।
ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्योतत् सनातनम् । भ्रातुः पुत्रान् प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान् ।। ४१ ।।
व्यासजीने कहा-माता सत्यवती! आप पर और अपर दोनों प्रकारके धर्मोंको जानती हैं। महाप्राज्ञे! आपकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। अतः मैं आपकी आज्ञा से धर्म को ही दृष्टि में रखकर (कामके वश न होकर ही) आपकी इच्छाके अनुरूप कार्य करूँगा। यह सनातन मार्ग शास्त्रोंमें देखा गया है। मैं अपने भाईके लिये मित्र और वरुणके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न करूँगा ।। ३९ -४१ ।।
व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया ।
संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः ।। ४२ ।।
न हि मामव्रतोपेता उपेयात् काचिदङ्गना ।
विचित्रवीर्य की स्त्रियों को मेरे बताये अनुसार एक वर्षतक विधिपूर्वक व्रत (जितेन्द्रिय होकर केवल संतानार्थ साधन) करना होगा, तभी वे शुद्ध होंगी। जिसने व्रतका पालन नहीं किया है, ऐसी कोई भी स्त्री मेरे समीप नहीं आ सकती ।। ४२ ।।
सत्यवत्युवाच
सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भ तथा कुरु ।। ४३ ।।
सत्यवतीने कहा- बेटा! ये दोनों रानियाँ जिस प्रकार शीघ्र गर्भ धारण करें, वह उपाय करो ।। ४३ ।।
अराजकेषु राष्ट्रेषु प्रजानाथा विनश्यति ।
नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता ।। ४४ ।।
राज्य में इस समय कोई राजा नहीं है। बिना राजाके राज्यकी प्रजा अनाथ होकर नष्ट हो जाती है। यज्ञ-दान आदि क्रियाएँ भी लुप्त हो जाती हैं। उस राज्यमें न वर्षा होती है, न देवता वास करते हैं ।। ४४ ।।
कथं चाराजंक राष्ट्र शक्यं धारयितुं प्रभो ।
तस्माद् गर्भ समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति ।। ४५ ।।
प्रभो! तुम्हीं सोचो, बिना राजाका राज्य कैसे सुरक्षित और अनुशासित रह सकता है। इसलिये शीघ्र गर्भाधान करो। भीष्म बालकको पाल-पोसकर बड़ा कर लेंगे ।। ४५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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