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कृष्णभक्तों में से एक है-- दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय :
महाभारत के अलावा और कंही कृष्णभक्त संजय जी के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। स्वभाव से बेहद विनम्र और धर्म- परायण होने के नाते वे पुत्रमोहान्ध महाराज धृतराष्ट्र और उनके दुष्ट पुत्रों को सही रास्ता दिखाने के लिए कभी- कभी खरी- खोटी बात सुनाते थे। उनके बात पर महाराज धृतराष्ट्र भी क्षुब्ध हो जाते थे। फिर भी यह निष्पक्ष- निर्भीक- धर्मप्राण- आदर्श चरित्र को काव्य- साहित्यकार और पुराण- वाचकों के द्वारा ज्यादा गुरुत्व नहीं दिया गया है।।
महाभारत युद्ध के समय उस युद्ध का सजीव- वर्णन सुनाने के लिए महर्षि वेदव्यास ने ही संजय को 'दिव्यदृष्टि' प्रदान की थी। असल में संजय तो पेशे से 'बुनकर' किन्तु अपनी विद्वत्ता से धृतराष्ट्र के मंत्री बने थे। किन्तु आश्चर्य की बात है-- कुरु- पांडवों की युद्ध के बाद उनके बारे में और कंही चर्चा होना आमतौर पर खत्म हो गई थी।।
विशेष तथ्य ये है कि-- संजय थे महर्षि वेदव्यास के गुरुकुल की शिष्य- मंडली में से एक होनहार छात्र। शिक्षा- समाप्ति के बाद संजय ने मंत्री विदुर जी के नीचे सहयोगी 'मंत्री' बनने से पहले, अपनी विद्वत्ता और सूझबूझ गुणों से ही वे धृतराष्ट्र की राजसभा में एक सम्मानित सभासद की हैसियत से दाखिला पाया था। मूलतः संजय थे 'बुनकर' कुल से और उनके विद्वान पिताश्री थे 'गावाल्गण' नामक एक सम्माननीय 'सूत'।।
बुद्धिमान मंत्री संजय को धृतराष्ट्र ने महाभारत युद्ध से ठीक पहले ही पांडवों के पास बातचीत करने के लिए भेजा था। वहां से आकर संजय जी ने धृतराष्ट्र को युधिष्ठिर का संदेश भी सुनाया था। कोरवों के राजसत्ता में एक मंत्री होने से भी संजय जी धर्मप्राण पाण्डवों के प्रति सहानुभुति रखते थे। इसलिए, निष्फल होने से भी धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों को अधर्म से रोकने के लिये वे कड़ी से कड़ी वचन कहने में कभी हिचकते नहीं थे। संजय जी अत्यंत कर्त्तव्य परायण मंत्री थे। इसलिए मंत्री- धर्म पालन कर हमेशा समय- समय पर धृतराष्ट्र को सही सलाह देते रहते थे।।
समय क्रम में शकुनि की चाल से जब दूसरी बार पांडवों ने जुआ में हारकर 13 सालों के लिए वनवास लेकर गए, तब संजय जी ने धृतराष्ट्र को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि-- ''ये क्या किया राजन ! इस कारण से कुरुवंश का समूल विनाश तो पक्का है, लेकिन साथ में निरीह प्रजा भी नाहक मारी जाएगी।" हालांकि धृतराष्ट्र तो उनकी स्पष्टवादिता पर अक्सर क्षुब्ध होना उनके अभ्यास बन गया था, इस बार भी असंतोष व्यक्त करके बैठ गए थे।।
तेरह सालों के बाद पांडवों ने प्रकट हो गए थे। इस समय भगवान कृष्ण भी दोनों पक्ष के विबाद का मीमांशा करने के लिए वंहा पधारे थे। किंतु शकुनि के प्रपंच से अहंकारी दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध के बिना सूच्यग्र भूमि भी देने से इनकार कर दिया, तो महायुद्ध की नौबत आ गयी थी। जब ये पक्का हो गया कि युद्ध को टाला नहीं जा सकता और दोनों पक्ष कुरुक्षेत्र में आमने- सामने होने की समय आ गया, तब महर्षि वेदव्यास ने पधार कर संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, ताकि वो युद्ध- क्षेत्र की सारी घटनाओं को महल में बैठकर ही देख लें और उसका हाल धृतराष्ट्र को सुनाएं। इसके बाद सायद विश्व के प्रथम धारावाहिक विबरणी देने वाला संजय जी ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र को महाभारत- युद्ध का हर अंश की दृश्यों की जीवंत- विवरण को लगातर सुनाया था।।
संजय जी ने युद्ध के धारा- विबरणी देते समय कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप, जो केवल अर्जुन को ही दिखाई दे रहा था, वे भी उसे दिव्यदृष्टि से देखा था। किन्तु युद्ध के बाद उनकी दिव्यदृष्टि नष्ट हो गयी थी।।
महाभारत युद्ध के बाद कई सालों तक संजय जी ने युधिष्ठर के राज्य में रहे थे। इसके बाद वो धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती के साथ संन्यास लेकर चले गए थे। परन्तु कुछ पौराणिक ग्रंथो के अनुसार वो धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद हिमालय चले गए थे। बस, संजय जी के बारे में इतनी ही विबरणी उपलब्ध है।।
RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI