#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣5️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकाशीतितमोऽध्यायः
सखियों सहित देवयानी और शर्मिष्ठा का वन-विहार, राजा ययाति का आगमन, देवयानी की उनके साथ बातचीत तथा
विवाह...(दिन 259)
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राजवद् रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च । को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ।। १३ ।।
आपके रूप और वेष राजाके समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी (विशुद्ध संस्कृत भाषा) बोल रहे हैं। मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ।। १३ ।।
ययातिरुवाच
ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः । राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ।। १४ ।।
ययातिने कहा- मैंने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ।। १४ ।।
देवयान्युवाच
केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागतः । जिघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया ।। १५ ।।
देवयानीने पूछा-महाराज ! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं? ।। १५ ।।
ययातिरुवाच
मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागतः । बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि तदनुज्ञातुमर्हसि ।। १६ ।।
ययातिने कहा-भद्रे ! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ। अतः अब मुझे आज्ञा दीजिये ।। १६ ।।
देवयान्युवाच
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह । त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव ।। १७ ।।
देवयानीने कहा- राजन्! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे सखा और पति हो जायें ।। १७ ।।
ययातिरुवाच
विद्धयौशनसि भद्रं ते न त्वामर्दोऽस्मि भाविनि । अविवाह्या हि राजानो देवयानि पितुस्तव ।। १८ ।।
ययाति बोले- शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो। भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं ।। १८ ।।
देवयान्युवाच
संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम् । ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाङ्ग वहस्व माम् ।। १९ ।।
देवयानीने कहा- नहुषनन्दन ! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं। अतः मुझसे विवाह कीजिये ।। १९ ।।
ययातिरुवाच
एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वराङ्गने ।
पृथग्धर्माः पृथक्छौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः ।। २० ।।
ययाति बोले-वरांगने ! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है; परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सब वर्णोंमें श्रेष्ठ हैं ।। २० ।।
देवयान्युवाच
पाणिधर्मो नाहूषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा । तं मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ।। २१ ।।
देवयानीने कहा- नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपहीने मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपहीका मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ ।। २१ ।।
कथं नु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत् । गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यृषिणा त्वया ।। २२ ।।
मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है ।। २२ ।।
ययातिरुवाच
क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् । दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता ।। २३ ।।
ययाति बोले- देवि ! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ।। २३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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