एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब जनमेजय ने महाभारत की कथा सुनी, तो उनके मन में अपने दिवंगत पिता राजा परीक्षित को देखने की तीव्र इच्छा हुई। वैशम्पायन और व्यास जी की तपोबल से जनमेजय को उनके पिता और पूर्वजों के दर्शन कराए गए। इससे उन्हें यह संतोष मिला कि उनके पूर्वज अब मोक्ष की राह पर हैं और उन्हें अब प्रतिशोध लेने की आवश्यकता नहीं है।
यह प्रसंग महाभारत के 'स्वर्गारोहण पर्व' के बाद का एक बहुत ही भावुक और दिव्य अध्याय है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे ज्ञान और भक्ति के माध्यम से एक पुत्र का शोक समाप्त हुआ और उसे अपने पिता की मुक्ति का साक्षात प्रमाण मिला।
जनमेजय का शोक और जिज्ञासा
जब ऋषि वैशम्पायन ने महाभारत की पूरी गाथा समाप्त की, तो राजा जनमेजय का हृदय ग्लानि और करुणा से भर गया। उन्होंने सुना कि कैसे उनके पूर्वजों ने महान युद्ध लड़ा, कैसे भगवान कृष्ण ने उनकी रक्षा की और अंत में कैसे उनके पिता राजा परीक्षित की मृत्यु एक ऋषि के श्राप और तक्षक के दंश से हुई।
जनमेजय ने वैशम्पायन जी से कहा— "हे मुनिवर, आपने मुझे सब कुछ सुनाया। लेकिन मेरे मन की शांति अब भी अधूरी है। मेरे पिता परीक्षित ने अकाल मृत्यु को प्राप्त किया। क्या वे अब भी उस कष्ट में हैं? क्या तक्षक का विष अभी भी उनकी आत्मा को तड़पा रहा है? क्या मैं उन्हें एक बार देख सकता हूँ?"
व्यास जी की दिव्य शक्ति
वहां उपस्थित महर्षि वेदव्यास जनमेजय की व्याकुलता को समझ गए। उन्होंने देखा कि जब तक जनमेजय अपनी आँखों से अपने पिता की सद्गति नहीं देख लेंगे, उनका मन शांत नहीं होगा।
व्यास जी ने जनमेजय से कहा— "राजन, तुम गंगा के तट पर चलो। मैं अपने तपोबल से तुम्हारे पूर्वजों और तुम्हारे पिता को वहां आमंत्रित करूँगा।"
गंगा तट पर अद्भुत दृश्य
जनमेजय अपनी रानियों और मंत्रियों के साथ गंगा के किनारे पहुंचे। रात का समय था और वातावरण अत्यंत शांत था। व्यास जी ने गंगा के जल में प्रवेश किया और दिव्य मंत्रों का उच्चारण शुरू किया।
अचानक, गंगा के जल से एक अलौकिक प्रकाश पुंज निकला। धीरे-धीरे उस प्रकाश से आकृतियाँ उभरने लगीं। देखते ही देखते वहां पांडव, कौरव, भीष्म, द्रोण और वे सभी योद्धा प्रकट हो गए जो कुरुक्षेत्र के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन सबके चेहरों पर एक दिव्य शांति थी। उनके मन से अब कोई द्वेष, कोई शत्रुता नहीं बची थी।
पिता परीक्षित से भेंट
उसी भीड़ के बीच से राजा परीक्षित बाहर निकले। उनका स्वरूप वैसा नहीं था जैसा जनमेजय ने कल्पना की थी (विष से झुलसा हुआ), बल्कि वे देवताओं के समान तेजस्वी दिख रहे थे।
परीक्षित को देखते ही जनमेजय उनके चरणों में गिर पड़े। परीक्षित ने उन्हें उठाकर गले लगाया और आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा— "पुत्र, शोक का त्याग करो। मैं अब इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर बढ़ रहा हूँ। तक्षक केवल एक माध्यम था, मेरी मृत्यु तो विधि का विधान थी। तुम धर्मपूर्वक राज्य करो और प्रजा की रक्षा करो।"
प्रतिशोध का अंत और आत्मज्ञान
कुछ समय बाद वे सभी दिव्य आत्माएं वापस गंगा जल में विलीन हो गईं। जनमेजय का सारा क्रोध, सारी शिकायतें और बदला लेने की भावना उसी गंगा जल में बह गई। उन्हें समझ आ गया कि:
मृत्यु अंत नहीं है: यह केवल एक यात्रा का पड़ाव है।
क्षमा ही शांति है: तक्षक को मारने से उनके पिता वापस नहीं आते, लेकिन क्षमा करने से जनमेजय का अपना जीवन सुधर गया।
कहानी का निष्कर्ष
जनमेजय ने उसी स्थान पर अपने पिता का तर्पण किया और पूरी श्रद्धा के साथ दान-पुण्य किया। व्यास जी और वैशम्पायन की कृपा से उन्हें वह 'ब्रह्म ज्ञान' प्राप्त हुआ जिससे एक राजा 'राजर्षि' बन जाता है। हस्तिनापुर वापस लौटकर उन्होंने एक नए युग की शुरुआत की जहाँ न्याय और क्षमा का बोलबाला था।
#महाभारत