जब स्मृति का स्विच ऑन हो जाता है... मैं कौन हूँ, किसकी संतान हूँ... तो परिस्थितियाँ दरवाज़े पर ही रुक जाती हैं। मन तक पहुँचने की ताक़त ही खो देती हैं।
असली बात यह है कि बाहरी हलचल तभी असर करती है जब भीतर का ध्यान भटक जाता है। लेकिन जैसे ही चेतना अपनी जगह पर लौटती है, हर परिस्थिति छोटी लगने लगती है और मन अपनी शांति वापस पा लेता है। यही भीतर की जागृति है, जो हमें हर स्थिति में हल्का, स्थिर और सहज बनाए रखती है
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