खुद से नाराज़ रहकर किसी को खुश नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारी हर भावना, हर शब्द और हर व्यवहार की शुरुआत हमारे भीतर से ही होती है।
जब हम स्वयं से असंतुष्ट रहते हैं, खुद को दोष देते हैं या भीतर ही भीतर नाराज़गी पालते हैं, तो वही बोझ हमारी एनर्जी में उतर आता है। ऐसे में भले ही हम मुस्कुराने की कोशिश करें, सामने वाले तक सच्ची खुशी नहीं पहुँच पाती। भीतर का असंतुलन बाहर के रिश्तों में भी तनाव बनकर झलकता है।
खुद से दोस्ती करना, खुद को स्वीकार करना और अपने प्रयासों को सम्मान देना बहुत ज़रूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी कमियों को नज़रअंदाज़ करें, बल्कि यह कि हम उन्हें समझदारी और करुणा से सुधारें। जब भीतर शांति होती है, तो व्यवहार में सहजता आती है। और यही सहजता दूसरों के लिए सुकून बन जाती है।
याद रखिए, आत्म-सम्मान और आत्म-प्रसन्नता कोई स्वार्थ नहीं है। यह वह आधार है जिस पर हम दूसरों को सच्ची खुशी दे सकते हैं। आज एक पल रुकिए, खुद को धन्यवाद दीजिए, और भीतर यह संकल्प जगाइए कि मैं पहले खुद के साथ शांति में रहूँगा… तभी दुनिया को भी खुशी बाँट पाऊँगा।
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