देव दुर्लभ श्रीमद्भागवत
==================
श्रीमद्भागवत के माहात्म्य में कहा गया है- जब श्री शुकदेव जी परीक्षित को कथा सुनाने लगे तब देवता लोग आये।
देवतओं ने कहा- ‘‘आप हम से अमृत ले लीजिये, राजा परीक्षित को पिला दीजिये। राजा परीक्षित अमर हो जायेंगे। यह कथासुधा हम को पिला दीजिये।
श्री शुकदेव जी ने कहा- कहाँ कथा कहाँ सुधा?
कहाँ मणि कहाँ काँच? मणि का मुकाबला काँच कर सकता है क्या? कथा का मुकाबला सुधा कर सकती है क्या?’’
अतः अनधिकारी समझकर देवताओं को कथामृत नहीं प्रदान किया, सुधा को ठुकरा दिया। ऐसा है सुरदुर्लभ यह श्रीमद्भागवत ---
"एवं विनिमये जाते सुधा राज्ञा प्रतीयताम्।
प्रपास्यामो वयं सर्वे श्रीमद्भागवतामृतम्।।
क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान्।
ब्रह्मरातो विचार्यैवं तदा देवांजहास ह।।
अभक्तांस्ताश्च विज्ञाय न ददौ स कथामृतम्।
श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्लभा।।"
अर्थात जब शुकदेव जी राजा परीक्षित को यह कथा सुनाने के लिये सभा में विराजमान हुए, तब देवता लोग उनके पास अमृत का कलश लेकर आये। देवगण अपना काम बनाने में बड़े कुशल होते हैं। वे इस अवसर पर भी भला कब चूकने वाले थे, उन्होंने शुकदेव जी को नमस्कार करके कहा- ‘आप यह अमृत ले लीजिये, बदले में हमें कथासुधा प्रदान कीजिये’ इस प्रकार परस्पर विनिमय का प्रस्ताव देवताओं ने रखा- ‘राजा परीक्षित अमृत का पान करें और हम श्रीमद्भागवत रूप अमृत का पान करेंगे।’
इस संसार में कहाँ काँच और कहाँ महामूल्य मणि?
कहाँ सुधा और कहाँ कथा?’
श्री शुकदेव जी ने यह विचार कर उस समय देवताओं की हँसी उड़ा दी, उन्हें भक्ति शून्य जानकर कथामृत का दान नहीं किया। इस प्रकार यह श्रीमद्भागवत की कथा देवताओं को भी दुर्लभ है।
जैसे निराकार निर्विकार अखण्ड परात्पर परब्रह्म का चिन्तन करने का अद्भुत महत्त्व है, वैसे ही चरित्र का भी वही महत्त्व है। जो चरित्रनायक है वही चरित्र है, ‘भक्तों के हृदय में भगवान कैसे प्रवेश करते हैं, कहाँ से आते हैं?’
इस पर कहते हैं- ‘प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण’ कर्णरन्ध्र से ही सर्वान्तरात्मा सर्वेश्वर सर्वशक्ति सम्पन्न भगवान भक्तों के हृदय में प्रवेश करते हैं।
"त्वं भावयोगपरिभावितहृत्सवरोज
आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्।
यद् यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति,
तत्तद् वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय।।"
भगवन! आपकी प्राप्ति का मार्ग केवल गुण-श्रवण से ही जाना जाता है। आप निश्चय ही भावुकों के भक्तियोग द्वारा विशुद्ध हुए हृदय-कमल में निवास करते हैं। पुण्यश्लोक प्रभो! आपके भक्तजन जिस-जिस भावना से आपका चिन्तन करते हैं, उन साधु-पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए आप वही-वही रूप धारण कर लेते हैं।
भावयोग से जिनका अन्तःकरण परिमार्जित है, परिशुद्ध है, उसमें आप आते हैं। पहले आपके अनन्त गुण-गणों का भक्त श्रवण करता है, श्रवण करने के बाद हृदय में आपके आने की बाट जोहने लगता है।
भगवान कब पधारते हैं?
अशरण- शरण अकारणकरुण करुणावरुणालय सर्वेंश्वर भगवान कब पधारते हैं, यही प्रतीक्षा करता है, फिर धीरे-धीरे भगवान भक्त के हृदय में आ जाते हैं ---
"सद्यो हृद्यवरुध्यतेअत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्"
जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, भगवान उसी समय अविलम्ब उनके हृदय में आकर बन्दी बन जाते हैं।
भगवच्चरितामृत का श्रृवण ही एकमात्र वह मार्ग है, जिससे भगवान् हृदय में प्रकट हो जाते हैं। अवरुद्ध कर लिये जाते हैं,हृदय में बन्दी बना लिये जाते हैं। निर्गुण- निर्विकार- निराकार- अद्वैत- अखण्ड- अनन्त- परब्रह्म या सगुण- निराकार- परात्पर- परब्रह्म या अचिन्त्य- कल्याण- गुणगणनिधान, अनन्त कोटिकन्दर्पदर्पदलनपटीयान् सगुण साकार सच्चिदानन्द घन परब्रह्म परमात्मा को हृदय में लाना हो (प्रकट करना हो) तो बड़ी कठिनाई है, भगवान का स्वरूप-सौन्दर्य हृदय में प्रकट होता ही नहीं तो ध्यान कैसे लगेगा?
ध्यान तो तब लगे, जब मन एकाग्र हो मन एकाग्र तब हो जब उसकी ओर मन का आकर्षण हो। आकर्षण तब हो जब उसमें लेाकोत्तर सौन्दर्य का प्राकट्य हो, माधुर्य का प्राकट्य हो।
वाल्मीकि-रामायण में लिखा है ---
"न हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात्।
नरः शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेअपि राघवे।।"
श्री रामभद्र की ओर जो एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था। श्रीराम के दूर चले जाने पर भी कोई उन पुरुषोत्तम की ओर से अपनी दृष्टि नहीं हटा पाता था।
भगवान राघवेन्द्र रामभद्र पधार रहे हैं, पुरवासी भगवान का दर्शन कर रहे हैं, उनके नयन भगवान के मधुर मंगलमय श्री अंग के सौन्दर्य, माधुर्य के रसास्वादन में संलग्न हैं। मन भी भगवान के मुखचन्द्र के अनन्त सौन्दर्यामृत, सौरस्यामृत, सौगन्ध्यामृत के रसास्वादन में संलग्न है। किसी में सामर्थ्य नहीं कि अपने नयनों को लौटा ले। भगवान के माधुर्यामृत का आस्वादन करते हुए नयनों को लौटा लें,यह किसी में सामर्थ्य नहीं, भगवान पधार गये लेकिन देखने वालों का मन लौट कर आया नहीं, नयन लौटकर आये नहीं।
अर्थात प्रभु के पधार जाने पर भी नयनों में वही रूप जगमगा रहा है, ‘उस नरोत्तम भगवान राम के चले जाने पर भी अपने नयनों को, मन को उनकी ओर से लौटाने में कोई समर्थ हुआ ही नहीं।’ यह चमत्कार भगवान के रूप का है, परन्तु उस रूप का यदि प्राकट्य हो जाय तब प्राकट्य न होना ही ध्यान में गड़बड़ी है।
निर्गुण निराकार निर्विकार परात्पर परब्रह्म का भी स्फुरण कठिन है, सगुण निराकार निर्विकार परात्पर परब्रह्म का स्फुरण भी कठिन है, सगुण साकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म का प्रादुर्भाव भी कठिन है, लेकिन चरित्र तो सहज है, सुगम है।
"श्रेयः स्त्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद् यथा स्थूतुषावघातिनाम्।।"
भगवन! आपकी भक्ति सब प्रकार के कल्याण का मूलस्त्रोत है। जो लोग इसे छोड़कर केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए श्रम उठाते और दुःख भोगते हैं, उनको बस क्लेश-ही-क्लेश हाथ लगता है और कुछ नहीं, जैसे थोथी भूसी कूटने वाले को केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं, कहीं बैठ जाओ, जहाँ कथा हो रही हो, कानों में भगवान का चरित्र आयेगा, कथामृत आयेगा। सानुराग कथामृत का पान करते रहो, मुक्ति माँगनी नहीं पडे़गी, मुक्ति में हिस्सेदार हो जाओगे, दया तो हठात प्राप्त होता है, किसी से माँगना नहीं पड़ता, दया में किसी का अहसान नहीं होता।
"तत्तेअनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुंजान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिविंदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्।।"
जो पुरुष प्रतिक्षण बड़ी उत्सुकता से आपकी कृपा का भली-भाँति अनुदर्शन अनुभव करता रहता है और प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मन से भोग लेता है; जो अनुरागपूर्ण हृदय से, गद्गद् वाणी और पुलकित शरीर से अपने आप को आपके चरणों में समर्पित किये ही रहता है, इस प्रकार जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति ठीक वैसे ही आपके परम पद का अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिता की सम्पत्ति का पुत्र, इस तरह भगवान का चरित्रामृत अमृत से अनन्तकोटिगुणित महत्त्वपूर्ण है। यह रस दुनियाँ के सब रसों से उत्कृष्ट रस है, इसीलिए कहा गया है-
"प्रायेण मुनयो राजन् निवृत्ता विधिषेधतः।
नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः।।"
निर्गुण परात्पर परब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित मुनीन्द्रगण भी भगवान के गुणसान श्रवण में, चरितामृत आस्वादन में, रमण करते हैं।
#श्रीमद्भागवत