sn vyas
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6 months ago
🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍 🚩 *🙏🏻जय श्री राधेकृष्णा सुप्रभातम्🙏🏻🚩*🔅🔱🌙 *श्री मद्भगवद्गीता🌞🔱🏛* *पोस्ट संख्या :-* 6⃣5⃣0⃣ 📖 *अध्याय -१८* *अथाष्टादशोSध्याय:* *मोक्षसन्न्यासयोग* *⇩⇩⇩* *श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा (६७-७८)🕉* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *श्लोक :-(१८/७७)* 📖 *तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे:।* *विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुन: पुन:॥ ७७॥* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *भावार्थ:-( १८/७७ )*📚 *हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण के उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूप को भी याद कर-करके मुझे बड़ा भारी आश्चर्य (हो रहा है) और (मैं) बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *व्याख्या परम श्रद्धैय श्री स्वामी रामसुखदास जी महाराज :-📝( १८/७७ )*👇 'तच्च संस्मृत्य ..... *पुन: पुन:’—संजयने पीछे के श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद को तो* 'अद्भुत’ *बताया, पर यहाँ भगवान्के विराट्रूप को* 'अत्यन्त अद्भुत’ *बताते हैं।* *इसका तात्पर्य है कि संवाद को तो अब भी पढ़ सकते हैं, उस पर विचार कर सकते हैं, पर उस विराट्रूप के दर्शन अब नहीं हो सकते। अत: वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।* *ग्यारहवें अध्याय के नवें श्लोक में संजय ने भगवान् को* 'महायोगेश्वर:’ *कहा था।* *यहाँ* 'विस्मयो मे महान्’ *पदों से कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूप को याद करने से महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात, अर्जुन को तो भगवान्ने कृपा से द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया, पर मेरे को तो व्यासजी की कृपा से देखने को मिल गया!* *यद्यपि भगवान्ने रामावतार में कौसल्या अम्बा को विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतार में यशोदा मैया को तथा कौरव-सभा में दुर्योधन आदि को विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ों में बड़े-बड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओं का महान् संहार हो रहा है। इस प्रकार के अत्यन्त अद्भुत रूप को याद करके संजय कहते हैं कि राजन्! यह सब तो व्यास जी महाराज की कृपा से ही मेरे को देखने को मिला है। नहीं तो ऐसा रूप मेरे-जैसे को कहाँ देखने को मिलता?* *परिशिष्ट भाव—भगवान्ने अपना विराट्रूप सीमित दिखाया था। अगर अर्जुन न घबराते तो भगवान् और भी रूप दिखाते। पर उतने से ही संजय बड़ा आश्चर्य कर रहे हैं।* *भगवान्के विषय में पहले तो संजय ने शास्त्र में पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट्रूप देखा।* *तात्पर्य है कि शास्त्र की अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवाद की अपेक्षा भी विराट्रूप अद्भुत था। इसलिये संजय ने संवाद को अद्भुत कहा*—'संवादमिममद्भुतम्’ (१८। ७६) *और विराट्रूप को अत्यन्त अद्भुत कहा*—'रूपमत्यद्भुतम्’। सम्बन्ध : *गीता के आरम्भ में धृतराष्ट्र का गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्ध का परिणाम क्या होगा? अर्थात् मेरे पुत्रों की विजय होगी या पाण्डुपुत्रों की? आगे के श्लोक में संजय धृतराष्ट्र के उसी प्रश्न का उत्तर देते हैं।* ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ *कल पढ़िए श्लोक 📖* 1⃣8⃣-7⃣8⃣ ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ *_जय श्री कृष्ण_* ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ 🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐 #श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान