श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान
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sn vyas
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श्रीमद्भागवत गीता #श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान 🪴पापों से मुक्ति का सरल उपाय – श्रीकृष्ण उपदेश‼️ “यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्, असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।” — भगवद्गीता 10.3 जो मुझे अजन्मा, अनादि तथा सम्पूर्ण लोकों का परमेश्वर रूप में तत्त्व से जान लेता है,वह मनुष्यों में असम्मूढ़ (अज्ञानरहित) होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। क्योंकि जब कोई “मुझे वास्तव में जैसा हूँ वैसा” जान लेता है, तो उसके भीतर का अज्ञान नष्ट हो जाता है; और अज्ञान के नष्ट होते ही पाप स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यही ज्ञान-योग का सीधा, गूढ़ और दिव्य फल है।
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sn vyas
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#श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान 🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍🌍 🚩 *🙏🏻जय श्री राधेकृष्णा सुप्रभातम्🙏🏻🚩*🔅🔱🌙 *श्री मद्भगवद्गीता🌞🔱🏛* *पोस्ट संख्या :-* 6⃣5⃣1⃣ 📖 *अध्याय -१८* *अथाष्टादशोSध्याय:* *मोक्षसन्न्यासयोग* *⇩⇩⇩* *श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा (६७-७८)🕉* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *श्लोक :-(१८/७८)* 📖 *यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।* *तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ ७८॥* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *भावार्थ:-( १८/७८ )*📚 *जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं (और) जहाँ गाण्डीव-धनुष-धारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति (और) अचल नीति है— (ऐसा) मेरा मत है।* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *व्याख्या परम श्रद्धैय श्री स्वामी रामसुखदास जी महाराज :-📝( १८/७८ )*👇 'यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:’— *संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुन का संरक्षण करने वाले, उनको सम्मति देने वाले, सम्पूर्ण योगों के महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञा का पालन करने वाले, भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्त गाण्डीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्ष में श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।* *भगवान्ने जब अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी, उस समय संजय ने भगवान् को 'महायोगेश्वर:’ कहा था, अब उसी महायोगेश्वर की याद दिलाते हुए यहाँ 'योगेश्वर:’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगों के ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञा का पालन करने वाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं।* *गीता में भगवान्के लिये 'महायोगेश्वर’, 'योगेश्वर’ आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियों को सिखाने वाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता; क्योंकि उनका योग स्वत:सिद्ध है। सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण हैं, वे सब-के-सब भगवान्में स्वत: रहते हैं, वे गुण भगवान् में नित्य रहते हैं, असीम रहते हैं। जैसे पिता का पिता, फिर पिता का पिता—यह परम्परा अन्त में जाकर परम-पिता परमात्मा में समाप्त होती है, ऐसे ही जितने भी गुण हैं, उन सबकी समाप्ति परमात्मा में ही होती है।* *पहले अध्याय में जब युद्ध की घोषणा का प्रसंग आया, तब कौरवपक्ष में सबसे पहले भीष्मजी ने शंख बजाया। भीष्मजी कौरव सेना के अधिपति थे, इसलिये उनका शंख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डव-सेना में सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शंख बजाकर युद्ध की घोषणा करते हैं! लौकिक दृष्टि से देखा जाय तो सबसे पहले शंख बजाने का भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता।*🐚 *फिर भी वे शंख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डव-सेना में सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बर में अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनों ने पाण्डव-सेना में सबसे पहले शंख बजाये।*🐚 *तात्पर्य यह हुआ कि संजय ने जैसे आरम्भ में (शंखवादन क्रिया में) दोनों की मुख्यता प्रकट की, ऐसे ही यहाँ अन्त में भी इन दोनों का नाम लेकर दोनों की मुख्यता प्रकट करते हैं।* *गीताभर में 'पार्थ’ सम्बोधन की अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुन के लिये इतनी संख्या में और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को* 'पार्थ’ *सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है।* *इसी रीति से अर्जुन को भी* 'कृष्ण’ *सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीता में 'कृष्ण’ *सम्बोधन की आवृत्ति* नौ *बार हुई है।* *भगवान्के सम्बोधनों में इतनी संख्या में दूसरे किसी भी सम्बोधन की आवृत्ति नहीं हुई है। अन्त में गीता का उपसंहार करते हुए संजय ने भी* 'कृष्ण’ *और* 'पार्थ’ *ये दोनों नाम लिये हैं।* 'तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम’— *लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति—ये सब 'श्री’ शब्द के अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं, वहाँ श्री रहेगी ही।* 'विजय’ *नाम अर्जुन का भी है और शूरवीरता आदि का भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षात्र-ऐश्वर्य रहेंगे ही।* *ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण होंगे, वहाँ 'विभूति’—ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामथ्र्य आदि सब-के-सब भगवद्गुण रहेंगे ही; और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे, वहाँ 'ध्रुवा नीति’—अटल नीति, न्याय, धर्म आदि रहेंगे ही।* *वास्तव में श्री, विजय, विभूति और ध्रुवा नीति—ये सब गुण भगवान् में और अर्जुन में हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यता को लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन—ये दोनों जहाँ रहेंगे, वहाँ अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त माधुर्य, अनन्त सौशील्य, अनन्त सौजन्य, अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।* *धृतराष्ट्र का* विजय की गूढ़ाभिसन्धिरूप *जो प्रश्न है, उसका उत्तर संजय यहाँ सम्यक् रीति से दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रों की* विजय निश्चित है, *इसमें कोई सन्देह नहीं है।* *ज्ञानयज्ञ: सुसम्पन्न: प्रीतये पार्थसारथे:।* *अंगीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सल:॥* *नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे।* *संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्॥* अठारहवें अध्याय के पद, अक्षर और उवाच *(१) इस अध्याय में 'अथाष्टादशोऽध्याय:’ के तीन, 'अर्जुन उवाच’ आदि पदों के आठ, श्लोकों के नौ सौ नवासी और पुष्पिका के तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदों का योग एक हजार तेरह है।* *(२) इस अध्याय में 'अथाष्टादशोऽध्याय:’ के सात, 'अर्जुन उवाच’ आदि पदों के पचीस, श्लोकों के दो हजार चार सौ छियानबे और पुष्पिका के अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरों का योग दो हजार पाँच सौ छिहत्तर है। इस अध्याय के सभी श्लोक बत्तीस अक्षरों के हैं।* *(३) इस अध्याय में चार उवाच हैं—दो 'अर्जुन उवाच’, एक 'श्रीभगवानुवाच’ और एक 'संजय उवाच’।* *अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द* *इस अध्याय के अठहत्तर श्लोकों में से बारहवें, छियालीसवें और बावनवें श्लोक के प्रथम चरण में* 'मगण’ *प्रयुक्त होने से* 'म-विपुला’; *तेईसवें, बत्तीसवें, सैंतीसवें, इकतालीसवें, पैंतालीसवें, छप्पनवें और सत्तरवें श्लोक के प्रथम चरण में* 'नगण’ *प्रयुक्त होने से* 'न-विपुला’; *तैंतीसवें, छत्तीसवें, सैंतालीसवें और पचहत्तरवें श्लोक के प्रथम चरण में* 'भगण’ *प्रयुक्त होने से* 'भ-विपुला’; *तेरहवें श्लोक के तृतीय चरण में* 'मगण’ *प्रयुक्त होने से* 'म-विपुला’; *छब्बीसवें श्लोक के तृतीय चरण में* 'रगण’ *प्रयुक्त होने से* 'र-विपुला’; *अड़तीसवें और चौंसठवें श्लोक के तृतीय चरण में* 'नगण’ *प्रयुक्त होने से* 'न-विपुला’; *उनचासवें श्लोक के प्रथम चरण में* 'मगण’ *प्रयुक्त होने से* 'म-विपुला’; *और तृतीय चरण में* 'भगण’ *प्रयुक्त होने से* 'भ-विपुला’ *संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनसठ श्लोक ठीक* 'पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् *छन्द के लक्षणों से युक्त हैं।* *जिसमें मोक्ष का भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्ति का वर्णन मुख्य होने के कारण इस अध्याय का नाम 'मोक्षसंन्यासयोग’ रखा गया है।* *ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥* *इस प्रकार ॐ तत् सत् —इन भगवन्नामों के उच्चारण पूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में 'मोक्षसन्न्यासयोग ’ नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥१८॥* ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ *हरे कृष्णा* *गीता में भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन का मार्गदर्शन किया और अर्जुन ने युद्ध किया इसी प्रकार मेरा मार्गदर्शन हमारे गीता गुरुकुल गुरूजी श्री बनवारीलाल शर्मा जी ने किया है और मैने ये साधक संजीवनि श्री मद्भगवद्गीता को आप सभी को तक पहुचाने का प्रयास किया है इन श्लोको में कही मुझसे कोई तुष्टि या (गलती) रह गयी हो तो मुझे कृपया क्षमा कर देना।* *में श्री बनवारीलाल शर्मा जी को साष्टांग दंडवत प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया और में ये ७०० श्लोक आप तक पहुँचा पाया हूँ*👣🚼🙏🏻💐 *_सादर जय श्री कृष्ण_* ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ 🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐
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