#श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान
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🚩 *🙏🏻जय श्री राधेकृष्णा सुप्रभातम्🙏🏻🚩*🔅🔱🌙 *श्री मद्भगवद्गीता🌞🔱🏛*
*पोस्ट संख्या :-* 6⃣4⃣7⃣
📖 *अध्याय -१८*
*अथाष्टादशोSध्याय:*
*मोक्षसन्न्यासयोग*
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*श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा (६७-७८)🕉*
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*श्लोक :-(१८/७४)* 📖
*सञ्जय उवाच*
*इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन:।*
*संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥ ७४॥*
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*भावार्थ:-( १८/७४ )*📚
*सञ्जय बोले-*
*इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुन का यह रोमांचित करने वाला अद्भुत संवाद सुना।*
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*व्याख्या परम श्रद्धैय श्री स्वामी रामसुखदास जी महाराज :-📝( १८/७४ )*👇
'इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन:’— *संजय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुन का यह संवाद सुना, जो कि अत्यन्त अद्भुत, विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्ष के मारे रोमांचित करने वाली है।*
*यहाँ* 'इति’ *पद का तात्पर्य है कि पहले अध्याय के बीसवें श्लोक में* 'अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज:’ *पदों से संजय श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद रूप गीता का आरम्भ करते हैं और यहाँ* 'इति’ *पद से उस संवाद की समाप्ति करते हैं।*
*अर्जुन के लिये* 'महात्मन:’ *विशेषण देने का तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं, जिनकी आज्ञा का पालन स्वयं भगवान् करते हैं!*
*अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दो (गीता—पहले अध्याय का इक्कीसवाँ श्लोक)*
*तो भगवान् दोनों सेनाओं के बीच में रथ को खड़ा कर देते हैं (गीता—पहले अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक)*
*गीता में अर्जुन जहाँ-जहाँ प्रश्न करते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान् बड़े प्यार से और बड़ी विलक्षण रीति से प्राय: विस्तार पूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुन के और भगवान् वासुदेव के संवाद को मैंने सुना है।*
'संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्’— *इस संवाद में अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है? शास्त्रों में प्राय: ऐसी बात आती है कि संसार की निवृत्ति करने से ही मनुष्य पारमार्थिक मार्ग पर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्यों में भी प्राय: ऐसी ही धारणा बैठी हुई है कि घर, कुटुम्ब आदि को छोड़कर साधु-संन्यासी होने से ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति, अवस्था, घटना, देश, काल आदि क्यों न हो, उसी के सदुपयोग से मनुष्य का कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं, वह परिस्थिति बढिय़ा-से-बढिय़ा हो या घटिया-से-घटिया, सौम्य-से-सौम्य हो या घोर-से-घोर विहित युद्ध-जैसी प्रवृत्ति हो, जिसमें दिन भर मनुष्यों का गला काटना पड़ता है, उसमें भी मनुष्य का कल्याण हो सकता है, मुक्ति हो सकती है। कारण कि जन्म-मरणरूप बन्धन में संसार का राग ही कारण है (गीता—तेरहवें अध्याय का इक्कीसवाँ श्लोक)*
*उस राग को मिटाने में परिस्थिति का सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थिति में राग-द्वेष न करके अपने कर्तव्य का पालन करता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्याय का तीसरा श्लोक)। यही इस संवाद में अद्भुतपना है।*
*भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य-जैसा काम करते हुए अपने-आपको प्रकट कर देना और 'मेरी शरण में आ जा’ यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य की बात कह देना—यही संवाद में रोमहर्षण करने वाला, प्रसन्न करने वाला, आनन्द देने वाला है।*
*परिशिष्ट भाव—गीता में 'महात्मा’ शब्द केवल भक्तों के लिये आया है। यहाँ संजय ने अर्जुन को भी 'महात्मा’ कहा है; क्योंकि वे अर्जुन को भक्त ही मानते हैं। भगवान्ने भी कहा है*—'भक्तोऽसि मे’ (गीता ४। ३)।
*सम्बन्ध :*
*पारमार्थिक मार्ग में सच्चे साधक को जिस-किसी से लाभ होता है, उसकी वह कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अत: संजय भी आगे के तीन श्लोकों में व्यासजी की कृतज्ञता प्रकट करते हैं।*
*_🙏🌷 जय श्री कृष्ण 🌷🙏_*
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*कल पढ़िए श्लोक 📖* 1⃣8⃣-7⃣5⃣
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