#श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान
पोस्ट क्रमांक 6️⃣4️⃣6️⃣ का शेष भाग
श्लोक-१८/७३
परिशिष्ट भाव—लौकिक स्मृति तो विस्मृति की अपेक्षा से कही जाती है, पर अलौकिक तत्त्व की स्मृति विस्मृति की अपेक्षा से नहीं है, प्रत्युत अनुभवरूप है। इस तत्त्व की निरपेक्ष स्मृति अर्थात् अनुभव को ही यहाँ 'स्मृतिर्लब्धा’ कहा गया है।
वास्तव में तत्त्व की विस्मृति नहीं होती, प्रत्युत विमुखता होती है। तात्पर्य है कि पहले ज्ञान था, फिर उसकी विस्मृति हो गयी—इस तरह तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती। अगर ऐसी विस्मृति मानें तो स्मृति होने के बाद फिर विस्मृति हो जायगी! इसलिये गीता में आया है—'यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्’ (४। ३५) अर्थात् उसको जान लेने के बाद फिर मोह नहीं होता। अभावरूप असत्को भावरूप मानकर महत्त्व देने से तत्त्व की तरफ से वृत्ति हट गयी—इसी को विस्मृति कहते हैं। वृत्तिका हटना और वृत्ति का लगना—यह भी साधक की दृष्टि से है, तत्त्व की दृष्टि से नहीं। तत्त्व की तरफ से वृत्ति हटने पर अथवा विमुखता होने पर भी तत्त्व ज्यों-का-त्यों ही है। अभावरूप असत्को अभावरूप ही मान लें तो भावरूप तत्त्व स्वत: ज्यों-का-त्यों रह जायगा।
विचार दो तरह का होता है। एक विचार करना होता है और एक विचार उदय होता है। जो विचार किया जाता है, उसमें तो क्रिया है, पर जो विचार उदय होता है, उसमें क्रिया नहीं है। विचार करने में तो बुद्धि की प्रधानता रहती है, पर विचार उदय होने पर बुद्धि से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अत: तत्त्वबोध विचार करने से नहीं होता, प्रत्युत विचार उदय होने से होता है।
तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्ति के उद्देश्य से सत्-असत्का विचार करते-करते जब असत् छूट जाता है, तब 'संसार है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं’—इस विचार का उदय होता है। विचार का उदय होते ही विवेक बोध में परिणत हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है और तत्त्व प्रकट हो जाता है; मानी हुई चीज मिट जाती है और वास्तविकता रह जाती है। विचार का उदय होने को यहाँ 'स्मृतिर्लब्धा’ कहा गया है।
अपरा प्रकृति भगवान्की है। परन्तु हमने गलती यह की है कि अपरा के साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् उसको अपना और अपने लिये मान लिया। यह सम्बन्ध हमने ही जोड़ा है और इसको छोडऩे की जिम्मेवारी भी हमारे पर ही है। अपरा के साथ सम्बन्ध मानने से ही भगवान्के नित्य-सम्बन्ध की विस्मृति हुई है और हम बन्धन में पड़े हैं। इसलिये अपरा के सम्बन्ध-विच्छेद से ही हमारा कल्याण होगा। अपरा से सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिये 'शरीर मेरा और मेरे लिये नहीं है’—इस विवेक को महत्त्व देना है। विवेक को महत्त्व देने से 'अपरा मेरी और मेरे लिये है ही नहीं’—यह स्मृति प्राप्त हो जाती है।
अर्जुन को द्वैत अथवा अद्वैत तत्त्व का अनुभव नहीं हुआ है, प्रत्युत द्वैत-अद्वैतसे अतीत वास्तविक तत्त्व का अनुभव हुआ है। कारण कि द्वैत-अद्वैत तो मोह हैं, जबकि अर्जुन का मोह नष्ट हो गया है।
जीव अनादिकाल से स्वत: परमात्मा का है, केवल संसार के आश्रय का त्याग करना है। अर्जुन को मुख्य रूप से भक्तियोग की स्मृति हुई है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। इसलिये भक्तियोग की स्मृति ही। वास्तविक है। भक्तियोग की स्मृति है
'वासुदेव: सर्वम्’ अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।
'वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव करना 'स्मृतिर्लब्धा’ है। यह अनुभव केवल भगवत्कृपा से ही होता है—'त्वत्प्रसादात्’। वचन सीमित होते हैं, पर कृपा असीम होती है।
चिन्तन में तो कर्तृत्व होता है, पर स्मृति में कर्तृत्व नहीं है। कारण कि चिन्तन मन से होता है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे अहम् है और अहम् से परे स्वरूप है, उस स्वरूप में स्मृति होती है। चिन्तन तो हम करते हैं, पर स्मृति में केवल उधर दृष्टि होती है। विस्मृति के समय भी तत्त्व तो वैसा-का वैसा ही है। तत्त्व में विस्मृति नहीं है, इसलिये उधर दृष्टि होते ही स्मृति हो जाती है।
'स्थितोऽस्मि गतसन्देह:’— *पहले क्षात्रधर्म की दृष्टि से युद्ध करना ठीक दीखता था, फिर गुरुजनों के सामने आने से युद्ध करना पाप दीखने लगा; परन्तु स्मृति प्राप्त होते ही सब उलझनें मिट गयीं। मैं क्या करूँ? युद्ध करूँ कि नहीं करूँ?—यह सन्देह, संशय, शंका कुछ नहीं रही। मेरे लिये अब कुछ करना बाकी नहीं रहा, प्रत्युत केवल आपकी आज्ञा का पालन करना बाकी रह।—'करिष्ये वचनं तव’। यही शरणागति है।
सम्बन्ध :
पहले अध्यायके बीसवें श्लोक में *'अथ’* पद से श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में गीता का आरम्भ हुआ था, अब आगे के श्लोक में *'इति’* पद से उसकी समाप्ति करते हुए *संजय* इस संवाद की महिमा गाते हैं।
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*कल पढ़िए श्लोक 📖1⃣8⃣-7⃣4⃣*
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