जब हम हर चीज़ को “मेरा” मान लेते हैं,
तो उसके साथ डर भी जुड़ जाता है—खोने का, बदलने का, टूटने का।
लेकिन जब हम खुद को एक मेहमान मानकर जीते हैं,
तो मन हल्का हो जाता है।
मेहमान आनंद लेता है, सराहता है,
पर बंधन नहीं बनाता… और वहीं से शांति शुरू होती है
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