🍇 अंगूर खट्टे नहीं हैं, बस हमारी छलांग छोटी है! जीवन का एक गहरा सत्य। ✨
बचपन में हम सबने उस लोमड़ी की कहानी ज़रूर सुनी है, जो ऊंचे पेड़ पर लगे पके अंगूरों तक न पहुँच पाने पर हार मान लेती है और जाते-जाते कहती है— "अंगूर खट्टे हैं, इन्हें पाने की क्या ज़रूरत!"
क्या हम भी अपने जीवन में ऐसा ही नहीं कर रहे हैं? 🤔
जो लोग जीवन के सच्चे आनंद, इसके फूलों और गीतों को उपलब्ध नहीं कर पाते, वे अक्सर यही कहते हैं कि— "जीवन बहुत बुरा है, जीवन असार और व्यर्थ है।" असल में, वे अपनी असफलता और कमियों को 'जीवन की निंदा' के आवरण में छिपा लेते हैं।
💡 याद रखिए: अगर जीवन के अंगूर न मिलते हों, तो उन्हें खट्टे मत कहिए। बल्कि यह स्वीकार करने का साहस रखिए कि "मेरी छलांग छोटी थी।"
🌟 अपनी छलांग बड़ी करिए!
अगर जीवन का रस और आनंद हाथ में न आ रहा हो, तो जीवन को कोसने के बजाय अपनी क्षमता को विस्तार दीजिए:
🔸 हाथ और बढ़ाइए: जीवन अगर पकड़ में न आए, तो अपने प्रयासों का दायरा बढ़ाइए।
🔸 दृष्टि को खोलिए: आँखें अगर सत्य न देख पाती हों, तो अपनी समझ के चक्षु और खोलिए।
🔸 श्रवण की साधना: कान अगर जीवन का संगीत न सुन पाते हों, तो उन्हें और गहराई से सुनने का प्रशिक्षण दीजिए।
🔸 स्वाद को साधिए: यदि भोजन में परमात्मा का रस न मिले, तो उसे नीरस कहकर मत छोड़िए। अपने स्वाद को शिक्षित कीजिए। नीरसता तो अंगूरों को खट्टा कहने जैसी ही दलील है!
परमात्मा हर जगह है, बस अनुभूति चाहिए:
जो लोग जीवन के रहस्य को जानते हैं, उन्हें 'अन्न' में भी ब्रह्म दिखाई पड़ा है और 'स्वर' में भी ब्रह्म की गूंज सुनाई दी है। इस जगत का हर सौंदर्य, यहाँ तक कि शरीर का सौंदर्य भी, भीतर बैठे परमात्मा की ही खबर बन जाता है... बस देखने वाली आँख चाहिए!
🌸 (नेति-नेति - न केवल यह, न केवल यह... परमात्मा का विस्तार अनंत है)
क्या आपने कभी अपनी किसी असफलता को परिस्थिति का दोष माना है? अपने विचार कमेंट्स में ज़रूर साझा करें। 🙏👇
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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