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1 months ago
HINDI DOCUMENTARY STORY दस्तावेज़ संख्या : कोचीन समुद्री जीव विज्ञान एवं तटीय अनुसंधान संस्थान — अप्रकाशित व्यक्तिगत क्षेत्र अभिलेख Year : 1957 यह घटना 1957 के अप्रैल महीने की है। केरल के कोझिकोड से करीब 32 किलोमीटर उत्तर में एक सुनसान पहाड़ी तटरेखा थी जिसे स्थानीय मछुआरे "शार्क वाला किनारा" बुलाते थे — लेकिन इस नाम के पीछे क्या था यह कोई नहीं जानता था। कोचीन समुद्री जीव विज्ञान संस्थान के दो शोधकर्ता — वरिष्ठ समुद्री जीव वैज्ञानिक डॉ. कुन्हीरामन और उनके सहायक बालन — उस अप्रैल में तटीय जीव सर्वेक्षण पर निकले थे। बालन के पास संस्थान का एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। उस दिन वे एक ऊँची पहाड़ी चट्टान के पीछे छुपकर बैठे थे। #lostfootage1957 सुबह के करीब 6 बज रहे थे। बालन ने नीचे तट की तरफ देखा। और उसने डॉ. कुन्हीरामन की बाँह पकड़ ली — बिना कुछ बोले। डॉ. कुन्हीरामन ने नीचे देखा। समुद्र के किनारे — गीली रेत पर — कुछ चल रहा था। पहली नज़र में यह समझ नहीं आया कि क्या देख रहे हैं। फिर डॉ. कुन्हीरामन ने दूरबीन निकाली। लगाई। और उनकी दूरबीन उनके हाथों से लगभग गिर गई। "कैमरा।" उन्होंने बालन से धीरे से कहा। #tralalerosamudra1957 वह एक शार्क थी। एक पूरी बड़ी शार्क — जैसी समुद्र में होती है। उसका पूरा शरीर शार्क का था — टारपीडो आकार, खुरदरी त्वचा, बड़ा डॉर्सल फिन, पेक्टोरल फिन, शार्क की पूँछ। शार्क का सिर — नुकीला थूथन, चौड़ा चपटा सिर, छोटी काली आँखें। लेकिन वह रेत पर चल रही थी। दो इंसानी पैरों पर। डॉ. कुन्हीरामन एक समुद्री जीव वैज्ञानिक थे — उन्होंने अपनी ज़िंदगी में हज़ारों समुद्री जीव देखे थे। उन्होंने बाद में अपनी डायरी में लिखा — "वह पैर बिल्कुल इंसानी थे। पूरे — जाँघ से लेकर पंजे तक। नंगे। और वे उस शार्क के पेट के नीचे से निकल रहे थे। जैसे वे हमेशा से वहाँ हों।" वह प्राणी समुद्र के किनारे इत्मीनान से टहल रहा था। उसके इंसानी पैर एक साधारण इंसानी चाल से चल रहे थे — बाएँ फिर दाएँ, बाएँ फिर दाएँ। उसकी शार्क की पूँछ पीछे हल्की-हल्की हिल रही थी। उसका डॉर्सल फिन ऊपर की तरफ खड़ा था। #sharkinsaan बालन का कैमरा चल रहा था। डॉ. कुन्हीरामन ने ज़ूम किया — जितना हो सका। उस शार्क के पंजे — इंसानी पंजे — गीली रेत पर निशान छोड़ रहे थे। बिल्कुल इंसानी पैरों के निशान। पाँचों उँगलियाँ। रेत में धँसते हुए। वह प्राणी करीब पैंतालीस मिनट तक तट पर रहा। इधर गया, उधर गया — जैसे कोई सुबह की सैर पर हो। उसने एक बार समुद्र की तरफ मुड़कर देखा — उसकी छोटी काली शार्क की आँखें पानी की तरफ थीं। फिर वह वापस समुद्र में उतर गया। धीरे-धीरे। उसके इंसानी पैर पानी में गए। उसकी शार्क की पूँछ पानी में हिली। और वह गायब हो गया। #unexplainedsamudra रेत पर उसके पैरों के निशान थे। इंसानी। पूरे। डॉ. कुन्हीरामन ने वह फ़िल्म रील संस्थान को कभी नहीं दी। उनकी डायरी के उस दिन की आखिरी लाइन थी — "विज्ञान के पास इसका कोई जवाब नहीं है। और शायद — होना भी नहीं चाहिए।" #unexplainedIndia — कोचीन समुद्री जीव विज्ञान एवं तटीय अनुसंधान संस्थान, अप्रकाशित व्यक्तिगत क्षेत्र अभिलेख, April 1957 #news