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1958 archival documentary photograph, black and white 16mm film still, extremely realistic old analog camera image, authentic mid-20th-century expedition photography, heavy film grain, visible scratches, dust particles, subtle exposure flicker, slightly soft focus, mild lens blur, faded contrast, imperfect film development, no modern sharpness, no digital effects, no cinematic color grading, #news view from the bottom of a remote Himalayan valley as if photographed by an unseen explorer, camera aimed upward toward a towering snow-covered Himalayan mountain peak, steep icy slopes, jagged rock formations, scattered snowfields, drifting mist, cold mountain atmosphere, overcast sky with bright glowing clouds, natural daylight, vast silent landscape, realistic geography and proportions, on the highest summit ridge, a gigantic and majestic dark silhouette of Goddess Durga standing motionless, visible only as a pure black shadow against the bright sky, recognizable by outline alone, large ornate crown on her head, multiple arms extending outward, one hand holding a tall trident, another holding a sword, flowing garments visible only in silhouette, long hair and divine aura suggested only by shape, no facial features visible, completely hidden in shadow, sacred and awe-inspiring presence, the colossal silhouette appears immense compared to the mountain peak, standing silently while clouds drift slowly behind her, sunlight glowing around the edges of the dark outline, realistic proportions, reverent and unexplained atmosphere, looks like a genuine lost photograph recovered from a forgotten 1950s Himalayan expedition archive, historically authentic and spiritually mysterious
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00:14
यह घटना 1950 के अक्टूबर महीने की है। कर्नाटक के दक्षिणी तट पर मंगलुरु से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर एक सुनसान पहाड़ी तटरेखा थी। मैसूर वन्यजीव अनुसंधान संस्थान के दो कर्मचारी — वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. बसवराज और उनके सहायक शंकर — उस अक्टूबर में तटीय वनस्पति और जीव विविधता का दस्तावेज़ीकरण कर रहे थे। शंकर के पास संस्थान का एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। उस दिन वे एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर थे जहाँ से नीचे का पूरा तट साफ़ दिखता था। #lostfootage1950 सुबह के करीब साढ़े सात बज रहे थे। शंकर ने नीचे तट की तरफ देखा — और रुक गया। "डॉक्टर साहब।" डॉ. बसवराज ने अपनी नोटबुक से नज़र उठाई। नीचे देखा। समुद्र के किनारे कुछ था। चार टाँगों पर। बड़ा। डॉ. बसवराज ने दूरबीन निकाली। लगाई। और फिर एक लंबी साँस ली। "कैमरा निकालो।" #oceangoat1950 वह एक बकरी थी। लेकिन यह कहना उसके साथ अन्याय था। जैसे किसी पहाड़ को "एक पत्थर" कहना। उसका शरीर किसी भी जंगली या पालतू बकरी से कई गुना बड़ा था। उसका धड़ भारी और गहरा था। उसकी खाल पर लंबे, घने, गहरे बाल थे — जो समुद्री नमक और पानी से भीगे और जमे हुए थे, मटमैले और भारी। वह रंग किसी भी जानी-पहचानी बकरी का नहीं था — एक गहरा भूरा-काला। और उसके सींग। डॉ. बसवराज ने बाद में अपनी डायरी में लिखा — "मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत से जानवर देखे हैं। बहुत से सींग देखे हैं। लेकिन उस बकरी के सींग — वे किसी और दुनिया के थे। वे उसके सिर से बाहर की तरफ और ऊपर की तरफ इतने बड़े फैले हुए थे कि उसके पूरे शरीर की चौड़ाई से भी ज़्यादा चौड़े थे। और उन पर गहरी-गहरी लकीरें थीं — जैसे सालों की छाप।" #samudribakri वह प्राणी समुद्र के किनारे इत्मीनान से टहल रही थी। इधर जाती, रुकती, उधर जाती। समुद्र की लहरें उसके बड़े खुरों को छूती थीं — वह परवाह नहीं करती थी। जैसे वह किनारा उसका अपना था। एक बार वह रुकी। समुद्र की तरफ मुँह किया। लहरों को देखती रही। शंकर ने ज़ूम किया। उस बकरी की आँखें — बड़ी, आयताकार पुतलियों वाली, शांत — समुद्र को देख रही थीं। जैसे कोई पुराना इंसान किसी जानी-पहचानी जगह को देखता है। डॉ. बसवराज ने लिखा — "उस पल मुझे लगा — यह बकरी यहाँ पहले भी आई है। कई बार। शायद बहुत पहले से।" #ancientcreature1950 उसकी ठुड्डी से एक लंबी मोटी दाढ़ी लटकी थी — हवा में बहुत धीरे हिलती हुई। उसके खुर गहरे और चौड़े थे — गीली रेत पर गहरे निशान छोड़ रहे थे। वह करीब एक घंटे तक किनारे पर टहलती रही। फिर — बिना किसी जल्दबाज़ी के — वह समुद्र की तरफ चली। धीरे-धीरे। उसके बड़े खुर पानी में उतरे। उसका भारी शरीर पानी में समाया। उसके लंबे बाल पानी की सतह पर फैले — फिर डूब गए। आखिर में उसके विशाल सींगों की नोकें दिखीं — पानी की सतह के ऊपर — और फिर वे भी गायब हो गईं। समुद्र वैसा ही था। #unexplainedIndia शंकर ने कैमरा नीचे किया। रेत पर खुरों के निशान थे — बड़े, गहरे — जो पानी तक जाते थे और खत्म हो जाते थे। डॉ. बसवराज नीचे उतरे। उन निशानों के पास गए। घुटनों के बल बैठे। एक निशान को ध्यान से देखा। उन्होंने डायरी में लिखा — "वह निशान किसी भी ज्ञात जानवर के खुर का नहीं था। और उसके किनारों पर — रेत पर — एक अजीब चमक थी। जैसे उस जगह कुछ पुराना छूट गया हो।" वह फ़िल्म रील संस्थान को कभी नहीं मिली। डॉ. बसवराज की डायरी के उस पन्ने पर एक आखिरी वाक्य था — "समुद्र के अपने जानवर हैं। और वे हमसे बहुत पुराने हैं।" — मैसूर वन्यजीव एवं तटीय प्रकृति अनुसंधान संस्थान, अप्रकाशित क्षेत्र अभिलेख, October 1950 #news
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00:16
यह घटना 1953 के मई महीने की है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम ज़िले के एक सुनसान तटीय इलाके में एक ऊँची पहाड़ी के कोने पर मद्रास प्राणी विज्ञान परिषद के दो वैज्ञानिक उस सुबह बैठे थे। वरिष्ठ प्राणी वैज्ञानिक डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई और उनके सहायक कार्तिकेयन — कार्तिकेयन के पास परिषद का एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। वे उस दिन तटीय पक्षियों का सर्वेक्षण करने आए थे और पहाड़ी के एक कोने पर छुपकर बैठे थे जहाँ से नीचे का पूरा तट दिखता था। #lostfootage1953 सुबह के करीब 7 बज रहे थे। कार्तिकेयन ने दूरबीन से नीचे तट की तरफ देखा। और दूरबीन नीचे कर ली। डॉ. पिल्लई ने देखा — कार्तिकेयन का चेहरा अजीब था। "क्या हुआ?" कार्तिकेयन ने दूरबीन उनकी तरफ बढ़ाई। बोला कुछ नहीं। डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई ने दूरबीन लगाई। नीचे समुद्र के किनारे — गीली रेत पर — कुछ खड़ा था जो इस दुनिया में होना नहीं चाहिए था। पहली नज़र में — हाथी। लेकिन डॉ. पिल्लई एक प्राणी वैज्ञानिक थे। उन्होंने पूरी दुनिया के हाथियों का अध्ययन किया था। और यह — यह किसी भी ज्ञात हाथी की प्रजाति नहीं था। वह शरीर हाथी जैसा था — लेकिन बहुत बड़ा। असाधारण रूप से बड़ा। उसका धड़ किसी बड़े पीपे जैसा गोल और भारी था। उसकी खाल सामान्य हाथी की खाल से ज़्यादा गहरी, ज़्यादा झुर्रीदार थी — जैसे उसने सालों समुद्र के पानी में बिताए हों। #lambigardan1953 और उसकी गर्दन। डॉ. पिल्लई ने बाद में अपनी डायरी में लिखा — "मैं उस गर्दन को देखकर पहले समझ ही नहीं पाया कि वह क्या है। वह इतनी लंबी थी कि पहले मुझे लगा मैं किसी अलग जानवर को देख रहा हूँ। फिर मैंने देखा — वह उसी शरीर की गर्दन है। जिराफ़ जितनी लंबी। लेकिन जिराफ़ की तरह पतली नहीं — मोटी। हाथी की गर्दन जितनी मोटी, लेकिन जिराफ़ जितनी लंबी।" उस लंबी गर्दन के ऊपर — एक हाथी का सिर था। सूँड़ थी। दाँत थे। लेकिन कान छोटे थे — सामान्य हाथी के बड़े पंखे जैसे कान नहीं। छोटे, गोल। वह प्राणी समुद्र के किनारे खड़ा था। उसके चारों पैर — जो किसी खंभे जैसे मोटे थे — गीली रेत में धँसे हुए थे। समुद्र की लहरें उसके पैरों को छू रही थीं। उसकी सूँड़ धीरे-धीरे हिल रही थी — बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से। कार्तिकेयन ने कैमरा निकाला। #samudrihaathi डॉ. पिल्लई ने उस प्राणी की ऊँचाई का अनुमान लगाने की कोशिश की। उन्होंने पास की चट्टानों से तुलना करके अंदाज़ा लगाया — और फिर डायरी में लिखा — "मेरा अनुमान गलत हो सकता है। लेकिन जो मैंने देखा उसके आधार पर — वह प्राणी किसी चार मंज़िला इमारत जितना ऊँचा था। सिर्फ गर्दन और सिर मिलाकर।" वह प्राणी वहाँ करीब डेढ़ घंटे रहा। उसने समुद्र में सूँड़ डाली। पानी पिया। अपनी लंबी गर्दन को एक तरफ से दूसरी तरफ घुमाया — धीरे-धीरे, बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से। एक बार वह समुद्र की तरफ थोड़ा आगे बढ़ा — पानी उसके घुटनों तक आ गया। डॉ. पिल्लई ने लिखा — "वह प्राणी समुद्र से डरा नहीं। वह उसे जानता था। जैसे समुद्र उसका घर हो।" #unexplainedIndia फिर वह वापस गहरे पानी की तरफ बढ़ा। धीरे-धीरे। उसके पैर पानी में उतरे। उसका शरीर पानी में समाया। उसकी लंबी गर्दन और सिर सबसे आखिर में पानी के ऊपर दिखे — फिर वे भी डूब गए। कार्तिकेयन ने कैमरा नीचे किया। दोनों काफी देर तक चुप रहे। डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई ने वह फ़िल्म रील परिषद को कभी नहीं दी। उन्होंने एक सामान्य रिपोर्ट लिखी — "तटीय पक्षी सर्वेक्षण पूर्ण।" उनकी डायरी के उस दिन की एंट्री के अंत में एक वाक्य था — "यह प्राणी किसी किताब में नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि जिसने भी इसे पहले देखा — उसने भी किसी को नहीं बताया।" #news
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00:15
#📲मेरा पहला पोस्ट😍 यह घटना 1949 के फरवरी महीने की है। केरल के कोचीन बंदरगाह के पास एक ऊँची पहाड़ी निगरानी चौकी पर उस सुबह नौसेना के दो जवान तटीय निगरानी की ड्यूटी पर थे। पेट्टी ऑफिसर करुणाकर नायर और उनके जूनियर सहायक विजयन — विजयन के पास उस चौकी का एक पुराना दूरबीन और एक फ़िल्म कैमरा था जो चौकी पर दस्तावेज़ीकरण के लिए रखा जाता था। उस सुबह आसमान पर बादल थे और समुद्र शांत था। #lostfootage1949 सुबह के करीब 6 बज रहे थे। विजयन ने दूरबीन से समुद्र की निगरानी कर रहा था — जैसा हर सुबह करता था। और फिर उसने दूरबीन नीचे की। फिर वापस लगाई। फिर नीचे की। करुणाकर नायर ने उसकी तरफ देखा — "क्या हुआ?" विजयन ने बिना कुछ कहे दूरबीन उनकी तरफ बढ़ा दी। करुणाकर नायर ने दूरबीन लगाई। समुद्र के बीचोंबीच — तट से कई किलोमीटर दूर — एक विशाल चक्राकार वस्तु बैठी हुई थी। खुले समुद्र में। एक छोटे से उजागर गीले समुद्री तल पर — जिसके चारों तरफ पानी ही पानी था। #ufosamudra1949 करुणाकर नायर एक अनुभवी नौसैनिक थे। उन्होंने समुद्र पर बहुत कुछ देखा था। लेकिन यह — यह उनकी किसी ट्रेनिंग में नहीं था। उन्होंने विजयन से कहा — "कैमरा।" वह वस्तु एक पुरानी, घिसी हुई, भारी धातु की तश्तरी थी। नीचे चपटी, ऊपर गुम्बद। पुरानी — बहुत पुरानी। उसकी धातु पर जंग और घिसावट के निशान थे। जैसे वह बहुत लंबे सफ़र के बाद किसी ने यहाँ उतार दी हो। उसका आधार उस गीले उजागर समुद्री तल पर टिका हुआ था — पानी से ऊपर, पानी से बाहर। लेकिन उसके चारों तरफ — हर दिशा में — समुद्र का पानी था। करुणाकर नायर ने बाद में अपनी निजी डायरी में लिखा — "वह वस्तु तट से इतनी दूर थी कि कोई नाव में भी वहाँ पहुँचने में काफी समय लगता। और वह वहाँ थी — अकेली — समुद्र के बीच में।" उस वस्तु पर रोशनियाँ थीं। अलग-अलग जगह। अलग-अलग लय में जल और बुझ रही थीं। करुणाकर ने लिखा — "वे रोशनियाँ किसी जहाज़ की रोशनियाँ नहीं थीं। वे अजीब थीं — जैसे वह वस्तु खुद साँस ले रही हो।" विजयन ने ज़ूम किया। उस वस्तु के किनारे पर — छोटी-छोटी गोल खिड़कियाँ थीं। और उन खिड़कियों में — अंदर — कुछ था। #alien1949 वे प्राणी थे। इंसानों जैसे नहीं — लेकिन खड़े थे। उनके सिर बड़े थे। उनकी आँखें बड़ी और काली थीं। वे खिड़कियों पर खड़े थे और बाहर देख रहे थे। बाहर नहीं आए। बस देखते रहे। करुणाकर नायर ने उस वक्त विजयन से कहा था — "रेडियो मत करो।" विजयन ने पूछा क्यों। करुणाकर ने कहा — "पहले देखो।" वे दोनों एक घंटे से ज़्यादा उस पहाड़ी चौकी पर रहे। विजयन का कैमरा चलता रहा। वह वस्तु हिली नहीं — पूरे समय वहीं रही। उस पर रोशनियाँ जलती-बुझती रहीं। वे प्राणी खिड़कियों पर खड़े रहे। फिर — बिना किसी चेतावनी के — वह वस्तु ऊपर उठने लगी। #unexplainedIndia धीरे-धीरे। शांति से। बिना किसी आवाज़ के। जब वह उस गीले समुद्री तल से उठी तो नीचे पानी का एक हल्का वृत्त बना — और मिट गया। कुछ ही देर में वह बादलों में चली गई। समुद्र वैसा ही था। खाली। शांत। करुणाकर नायर ने उस दिन की ड्यूटी रिपोर्ट में लिखा — "कोई असामान्य गतिविधि नहीं।" विजयन की फ़िल्म रील कभी किसी को नहीं मिली। करुणाकर नायर 1962 में नौसेना से रिटायर हुए। उनकी निजी डायरी उनके परिवार को मिली। उस डायरी में उस दिन की एंट्री के अंत में एक वाक्य था — "जो उन खिड़कियों में थे — वे हमें देख रहे थे। और उनकी आँखों में कोई सवाल नहीं था। जैसे उन्हें पहले से पता था कि हम वहाँ होंगे।" #news
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