#❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #💓 मोहब्बत दिल से #🌞 Good Morning🌞 #episodic #💝 शायराना इश्क़
— Cochin Maritime History and Nautical
Archaeology Council, Unpublished
Personal Field Record, June 1950
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Trivandrum Pilgrimage and Archaeological
Research Council, Unpublished Personal
Field Record, July 1951
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was at home on that shoreline in a
way I have never been at home anywhere
in my life."
— Madras Coastal Zoology and Wildlife
Research Centre, Unpublished Personal
Field Record, February 1956
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Field Record, February 1956
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Madras Coastal Zoology and Wildlife
Research Centre, Unpublished Personal
Field Record, February 1956
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HINDI DOCUMENTARY STORY
दस्तावेज़ संख्या : रामेश्वरम् तीर्थ एवं पुरातत्व
अनुसंधान परिषद — अप्रकाशित व्यक्तिगत अभिलेख
Year : 1948
यह घटना 1948 के मार्च महीने की है। तमिलनाडु के
रामेश्वरम् से करीब 18 किलोमीटर दक्षिण में एक ऊँची
पहाड़ी थी जिसे स्थानीय लोग "मर्यादा पर्वत" बुलाते
थे — यह नाम कहाँ से आया यह कोई नहीं जानता था।
रामेश्वरम् तीर्थ परिषद के एक युवा शोधकर्ता
वेंकटेश्वरन उस मार्च में तटीय पुरातत्व स्थलों का
दस्तावेज़ीकरण कर रहे थे। उनके पास परिषद का
एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। उस दिन वे पहाड़ी के
नीचे बड़ी-बड़ी चट्टानों के पीछे छुपकर बैठे थे।
#lostfootage1948
सुबह के करीब 5 बज रहे थे। सूर्योदय से पहले
का वक्त।
वेंकटेश्वरन ने ऊपर पहाड़ की चोटी की तरफ देखा।
और वे वहीं रुक गए।
पहाड़ की चोटी पर — आसमान के सामने — एक
विशाल आकृति खड़ी थी।
वेंकटेश्वरन ने दूरबीन निकाली। हाथ काँप रहे
थे। लगाई। #divinedarshan1948
जो दिखा — वे शब्दों में नहीं बता पाए। बाद में
उन्होंने अपनी डायरी में लिखा — "वह आकृति एक
पुरुष की थी। लेकिन कोई साधारण पुरुष नहीं। उनका
शरीर — इतना बड़ा, इतना शक्तिशाली — जैसे
पर्वत स्वयं खड़ा हो। उनके कंधे इतने चौड़े थे कि
आसमान का एक हिस्सा ढक गया था। उनकी छाती
इतनी गहरी और चौड़ी थी। और वे नीचे पहने
एक सफ़ेद धोती में थे — बस धोती। ऊपर से नंगे।
शरीर पर्वत जैसा।"
और उनके हाथ में — एक धनुष था।
एक बड़ा, प्राचीन, शक्तिशाली धनुष।
वेंकटेश्वरन ने अपनी डायरी में लिखा — "उनके
बाल — वे बाल जो मैंने देखे — वे बिल्कुल वैसे
ही थे जैसे मंदिरों में श्रीराम की मूर्तियों पर देखे
थे। बिल्कुल वैसे। मैं एक शोधकर्ता हूँ। मैंने बहुत
सारी मूर्तियाँ देखी हैं। वे बाल उनसे अलग नहीं थे।"
#ramdarshan
वह आकृति — वह विशाल, शक्तिशाली, अद्भुत
आकृति — पहाड़ की चोटी पर बिल्कुल स्थिर खड़ी
थी। समुद्र की तरफ देखती हुई। उन्होंने पीछे नहीं
देखा। इधर-उधर नहीं देखा। बस — समुद्र की तरफ।
जैसे वे किसी दूर की चीज़ को देख रहे हों जो
हम नहीं देख सकते।
उनका धनुष उनके हाथ में था — आराम से, स्वाभाविक
तरीके से। जैसे वह धनुष उनका एक हिस्सा हो।
वेंकटेश्वरन का कैमरा चल रहा था। वे नीचे
चट्टानों के पीछे बैठे थे और ऊपर की तरफ रिकॉर्ड
कर रहे थे। उनकी डायरी में लिखा है — "मैं उठना
चाहता था। नीचे माथा टेकना चाहता था। लेकिन
मैं हिल नहीं पाया। जैसे उस दृश्य ने मुझे वहीं
रोक दिया हो।"
वह आकृति करीब बीस मिनट तक उस चोटी पर
रही।
फिर — बिना किसी हलचल के, बिना किसी आवाज़
के — वह वहाँ नहीं थी। #unexplainedIndia
वेंकटेश्वरन ने ऊपर देखा — चोटी खाली थी।
आसमान खाली था।
समुद्र नीचे वैसा ही था — शांत, विशाल।
वेंकटेश्वरन उस दिन बहुत देर तक उन चट्टानों
के पास बैठे रहे।
वह फ़िल्म रील उन्होंने परिषद को कभी नहीं दी।
उनकी डायरी के उस दिन की आखिरी लाइन थी —
"जो मैंने आज देखा — वह किसी को बताने की
बात नहीं है। कुछ दृश्य सिर्फ देखने के लिए होते
हैं। बताने के लिए नहीं।"
#rameshwaram1948
— रामेश्वरम् तीर्थ एवं पुरातत्व अनुसंधान परिषद,
अप्रकाशित व्यक्तिगत अभिलेख, March 1948 #news




