#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣3️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
कुन्ती का पाण्डु को व्युषिताश्व के मृत शरीर से उसकी पतिव्रता पत्नी भद्रा के द्वारा पुत्र-प्राप्ति का कथन...(दिन 353)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत । कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज जनमेजय! इस प्रकार कहे जानेपर कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डुसे इस प्रकार बोली- ।। १ ।।
न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन । धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने ।। २ ।।
'धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ ।। २ ।।
त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत । वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि ।। ३ ।।
'महाबाहु वीर भारत ! आप ही मेरे गर्भसे धर्मपूर्वक अनेक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करेंगे ।। ३ ।।
स्वर्ग मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया । अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन ।। ४ ।।
'नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्गलोकमें चलूँगी। कुरुनन्दन ! पुत्रकी उत्पत्तिके लिये आप ही मेरे साथ समागम कीजिये ।। ४ ।।
न ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् । त्वत्तः प्रतिविशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः ।। ५ ।।
'मैं आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषसे समागम करनेकी बात मनमें भी नहीं ला सकती। फिर इस पृथ्वीपर आपसे श्रेष्ठ दूसरा मनुष्य है भी कौन ।। ५ ।।
इमां च तावद् धर्मात्मन् पौराणीं शृणु मे कथाम् ।
परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम् ।। ६ ।।
'धर्मात्मन् ! पहले आप मेरे मुँहसे यह पौराणिक कथा सुन लीजिये। विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है ।। ६ ।।
व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः । पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वशविवर्धनः ।। ७ ।।
'कहते हैं, पूर्वकालमें एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उनका नाम था व्युषिताश्व। वे पूरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे ।। ७ ।।
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे ।
उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्रा देवर्षिभिः सह ।। ८ ।।
'एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ।। ८ ।।
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः ।। ९ ।।
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा । व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान् व्यरोचत ।। १० ।।
'उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन् ! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे ।। ९-१० ।।
सर्वभूतान् प्रति यथा तपनः शिशिरात्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन् राजसत्तमः ।। ११ ।।
प्राच्यानुदीच्यान् पाश्चात्त्यान् दाक्षिणात्यानकालयत् । अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान् ।। १२ ।।
'राजा व्युषिताश्व समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान् यज्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण- चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान् सूर्य-देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं- सबको तपाने लगते हैं ।। ११-१२ ।।
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वितः । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।। १३ ।।
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम । व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम् ।। १४ ।।
अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान् । यजमानो महायज्ञैर्बाह्मणेभ्यो धनं ददौ ।। १५ ।।
'उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं- 'राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया ।। १३-१५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️