sn vyas
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4 days ago
#प्रसिद्ध तीर्थ स्थल #तीर्थ स्थल राजस्थान की सुनहरी रेत के मध्य एक ऐसा तीर्थ स्थित है, जहाँ पहुँचते ही मन में अद्भुत शांति का अनुभव होता है। यह है पवित्र पुष्कर धाम—एक ऐसी भूमि जहाँ झील की लहरों में भक्ति झलकती है, मंदिरों की घंटियों में श्रद्धा गूँजती है और वातावरण का प्रत्येक कण दिव्यता से ओत-प्रोत प्रतीत होता है। लेकिन इसी पावन नगरी से जुड़ी एक ऐसी कथा भी है जिसने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के भाग्य को सदैव के लिए बदल दिया। एक समय था जब देवता, ऋषि और मनुष्य सभी भगवान ब्रह्मा की आराधना करते थे। आखिर सम्पूर्ण सृष्टि के रचनाकार वही तो थे। पृथ्वी, आकाश, पर्वत, नदियाँ, वनस्पतियाँ और समस्त जीव-जगत उनकी ही सृजन शक्ति का परिणाम थे। किन्तु एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी पूजा को लगभग समाप्त कर दिया। आश्चर्य की बात यह है कि यह श्राप किसी असुर या दैत्य ने नहीं, बल्कि उनकी अपनी अर्धांगिनी देवी सावित्री ने दिया था। कथा के अनुसार एक समय पृथ्वी पर अधर्म और अराजकता का प्रभाव बढ़ने लगा। ऋषियों के यज्ञों में विघ्न डाले जाने लगे और नकारात्मक शक्तियाँ बलवान होती जा रही थीं। तब देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की कि वे एक महायज्ञ का आयोजन करें, जिससे संसार में पुनः धर्म और शांति की स्थापना हो सके। भगवान ब्रह्मा ने ध्यानमग्न होकर यज्ञ के लिए एक पवित्र स्थान का चयन किया। उन्होंने अपने हाथ से एक कमल पुष्प पृथ्वी की ओर छोड़ा और वह आकर जिस स्थान पर गिरा, वहाँ एक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया। वही स्थान आगे चलकर पुष्कर कहलाया और देवभूमि के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यज्ञ की तैयारियाँ आरम्भ हुईं। चारों दिशाओं से ऋषि, मुनि और देवता वहाँ एकत्र होने लगे। पूरा वातावरण वैदिक मंत्रों की ध्वनि से गूँज उठा। किन्तु तभी एक समस्या उत्पन्न हो गई। वैदिक परम्परा के अनुसार पत्नी के बिना कोई भी महायज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता। भगवान ब्रह्मा अपनी पत्नी देवी सावित्री की प्रतीक्षा कर रहे थे। अनेक संदेश भेजे गए, देवदूत उन्हें बुलाने गए, लेकिन वे समय पर नहीं पहुँच सकीं। उधर यज्ञ का शुभ मुहूर्त तेजी से बीत रहा था। ऋषियों ने चिंता व्यक्त की कि यदि यज्ञ नियत समय पर प्रारम्भ नहीं हुआ तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। तब देवराज इन्द्र ने एक उपाय सुझाया। उन्होंने गायत्री नामक एक दिव्य कन्या को यज्ञ में सहभागी बनाने का प्रस्ताव रखा। गायत्री कोई साधारण स्त्री नहीं थीं, बल्कि स्वयं दिव्य शक्ति का स्वरूप मानी जाती थीं। ऋषियों की सहमति से भगवान ब्रह्मा ने गायत्री से विवाह किया और यज्ञ की मर्यादा बनाए रखने हेतु उनके साथ यज्ञ मंडप में विराजमान हो गए। इसी बीच देवी सावित्री भी पुष्कर पहुँच गईं। वे अत्यंत प्रसन्न थीं कि इस महान अनुष्ठान में अपने पति के साथ सहभागी बनेंगी। लेकिन जैसे ही उनकी दृष्टि यज्ञ मंडप पर पड़ी, उनका हृदय टूट गया। उन्होंने देखा कि भगवान ब्रह्मा के समीप कोई अन्य स्त्री बैठी हुई है। क्षण भर में उनके हर्ष का स्थान पीड़ा ने ले लिया। यह केवल एक पत्नी का दुख नहीं था, बल्कि विश्वास के आहत होने की वेदना थी। धीरे-धीरे उनका दुःख प्रचंड क्रोध में परिवर्तित हो गया। देवी सावित्री की वाणी यज्ञ मंडप में गूँज उठी— “हे ब्रह्मा! क्या यज्ञ इतना महत्वपूर्ण था कि तुम मेरी प्रतीक्षा भी न कर सके? मेरे रहते तुमने दूसरा विवाह कर लिया?” उनके शब्दों से पूरा वातावरण स्तब्ध हो गया। देवता मौन हो गए, ऋषियों ने सिर झुका लिए और अग्नि की ज्वालाएँ भी मानो शांत पड़ गईं। क्रोध से भरी देवी सावित्री ने कहा— “मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा नहीं होगी। लोग तुम्हें सृष्टि का रचयिता तो मानेंगे, पर तुम्हारे मंदिर नहीं बनेंगे और तुम्हारी आराधना नहीं करेंगे।” यह श्राप सुनकर देवता भी भयभीत हो उठे। क्योंकि यह किसी साधारण स्त्री का नहीं, स्वयं आदिशक्ति का वचन था। भगवान ब्रह्मा ने शांत भाव से सब कुछ स्वीकार कर लिया। उन्होंने न कोई विरोध किया और न ही क्रोध प्रकट किया। शायद वे समझते थे कि सावित्री की पीड़ा उचित थी। समय बीतने के साथ देवी सावित्री का क्रोध शांत हुआ। तब उन्हें अनुभव हुआ कि आवेश में उन्होंने अत्यंत कठोर श्राप दे दिया है। इसलिए उन्होंने अपने वचनों में कुछ परिवर्तन करते हुए कहा— “यद्यपि पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा नहीं होगी, किन्तु एक स्थान ऐसा अवश्य रहेगा जहाँ तुम्हारी आराधना की जाएगी, और वह स्थान होगा पुष्कर।” तभी से पुष्कर भगवान ब्रह्मा की उपासना का प्रमुख और सर्वाधिक पवित्र केंद्र माना जाता है। आज भी जब श्रद्धालु पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें यह कथा स्मरण कराई जाती है। संसार में भगवान शिव, विष्णु, देवी और हनुमान के असंख्य मंदिर मिलते हैं, लेकिन भगवान ब्रह्मा के मंदिर अत्यंत दुर्लभ हैं। लोकमान्यता है कि इसका कारण देवी सावित्री का वही प्राचीन श्राप है। यह कथा केवल एक श्राप की कहानी नहीं है, बल्कि सम्मान, विश्वास और संबंधों की मर्यादा का संदेश भी देती है। यह हमें स्मरण कराती है कि चाहे कोई कितना भी महान क्यों न हो, रिश्तों का आदर और विश्वास का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है। शायद यही कारण है कि सृष्टि के रचयिता होने के बावजूद भगवान ब्रह्मा का सबसे प्रसिद्ध और पूजनीय मंदिर आज भी केवल पुष्कर में ही स्थित है, जहाँ उनकी कथा युगों से श्रद्धा के साथ सुनाई जाती रही है।