माता अदिति को भगवान विष्णु के दर्शन क्यों हुए? — सरल और भावपूर्ण कथा
जब दैत्यराज बलि ने अपने पराक्रम और तप के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं का राज्य छिन गया। देवराज इन्द्र सहित सभी देवता दुःखी और निराश हो गए। अपने पुत्रों की यह दशा देखकर उनकी माता अदिति अत्यंत व्याकुल हुईं।
अपने पुत्रों के कल्याण और धर्म की पुनः स्थापना के लिए अदिति ने अपने पति महर्षि कश्यप के निर्देशानुसार कठोर व्रत, तपस्या और भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति आरम्भ की। उनकी भक्ति इतनी निष्काम, पवित्र और गहन थी कि भगवान विष्णु स्वयं प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान ने कहा, "हे धर्मपरायणा अदिति! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो इच्छा तुम्हारे हृदय में है, उसे निःसंकोच कहो। मेरे दर्शन कभी निष्फल नहीं होते।"
माता अदिति ने विनम्रतापूर्वक कहा, "प्रभो! मुझे अपने पुत्र इन्द्र के खोए हुए राज्य का उतना दुःख नहीं है, जितना इस बात का कि देवताओं का धर्मसम्मत अधिकार और यज्ञभाग छिन गया है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे पुत्र को उसका उचित स्थान और अधिकार पुनः प्राप्त हो।"
भगवान विष्णु उनकी निःस्वार्थ भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "देवि! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। मैं स्वयं तुम्हारे गर्भ से अवतार लेकर देवताओं की सहायता करूँगा और अधर्म का नाश करूँगा।"
यह सुनकर अदिति ने आश्चर्य और विनम्रता से कहा, "हे जगत्पालक! समस्त ब्रह्माण्ड जिनमें स्थित है, ऐसे आपके दिव्य स्वरूप को मैं अपनी कोख में कैसे धारण कर सकूँगी?"
भगवान मुस्कराकर बोले, "हे नन्दिनि! इसकी चिंता मत करो। मैं स्वयं अपना और तुम्हारा भार वहन करूँगा। तुम्हें किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होगी।"
इतना कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए। कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। उनके गर्भ में आते ही सम्पूर्ण सृष्टि में अद्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगे। पृथ्वी, पर्वत और समुद्र तक उस दिव्य घटना के प्रभाव को अनुभव करने लगे। दूसरी ओर दैत्यों का तेज क्षीण होने लगा, क्योंकि भगवान के अवतरण का समय निकट आ चुका था।
कालांतर में भगवान विष्णु ने वामन अवतार के रूप में माता अदिति और महर्षि कश्यप के घर जन्म लिया। आगे चलकर उन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और अपने विराट रूप से तीनों लोकों को पुनः देवताओं को सौंपकर धर्म की स्थापना की।
इस प्रकार भगवान विष्णु ने माता अदिति को दर्शन इसलिए दिए क्योंकि उनकी भक्ति निष्काम, अटूट और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित थी।
॥ जय श्री वामनदेव भगवान ॥
॥ जय श्री हरि ॥
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