हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ वर्ष का तीसरा महीना होता है, ज्येष्ठ या जेठ माह को गर्मी का महीना भी कहा जाता है।
इस महीने में जल की पूजा की जाती है और इस माह में जल को लेकर दो त्योहार मनाए जाते हैं, पहला गंगा दशहरा और दूसरा निर्जला एकादशी। ज्येष्ठ मास जो दिन में सोए, ओकर जर असाढ़ में रोए, यह घाघ की कहावत है।
ज्येष्ठ महीने के दौरान पड़ने वाले मंगलवार को बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल कहा जाता है, जो हनुमान जी की कृपा पाने का विशेष दिन माना जाता है।
ज्येष्ठ माह में हनुमान जी की श्रद्धा भाव से पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। बड़े मंगल के दिन व्रत रखने और हनुमान जी की आराधना करने से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और बजरंगबली की कृपा बनी रहती है।
यानी जो व्यक्ति जेष्ठ के महीने में दिन में सोता है वह रोगी होता है। साथ ही ज्येष्ठ में दोपहर में चलना मना है, इस समय धूप में चलने से व्यक्ति बीमार हो सकता है।
ज्येष्ठ के महीने में तिल का दान उत्तम होता है, शिवपुराण में कहा गया है कि इस महीने में तिल के दान से अकाल मृत्यु बाधा दूर होती है और स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
#❤️Love You ज़िंदगी ❤️
शिंगणापुर के शनिदेव की कथा :
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर गाँव भगवान शनि देव को समर्पित है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शनिदेव की मूर्ति किसी मंदिर के अंदर नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे एक चबूतरे पर विराजमान है।
मान्यता है कि कई वर्षों पहले इस क्षेत्र में भारी बारिश और बाढ़ आई। बाढ़ के बाद एक बड़ा काला पत्थर पास की धारा में बहकर आया। जब एक चरवाहे ने उत्सुकता में उस पत्थर को डंडे से छुआ, तो उसमें से खून निकलने लगा। यह देखकर लोग चकित रह गए।
उसी रात गाँव के एक व्यक्ति को स्वप्न में शनिदेव ने दर्शन देकर बताया कि वही पत्थर उनका स्वरूप है। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी छत के नीचे न रखा जाए, बल्कि खुले स्थान पर स्थापित किया जाए। साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि वे स्वयं इस गाँव की रक्षा करेंगे।
इस कथा के बाद गाँव वालों ने पत्थर को चबूतरे पर स्थापित किया और पूजा शुरू की। समय के साथ एक अनोखी परंपरा बनी। गाँव के घरों में दरवाजे या ताले नहीं लगाए जाते। लोगों का विश्वास है कि यदि कोई चोरी या गलत काम करेगा, तो शनिदेव उसे तुरंत दंड देंगे। इसी वजह से यहाँ अपराध लगभग न के बराबर माना जाता है।
हर शनिवार को यहाँ विशेष पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। माना जाता है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने पर शनिदेव कष्टों को दूर करते हैं और न्याय प्रदान करते हैं।
इस तरह शिंगणापुर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि आस्था और विश्वास का अनोखा उदाहरण भी है।
🙏 ॐ शं शनैश्चराय नमः 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
अधराम मधुरम, वदनम मधुरम,
नयनम मधुरम, हसितम मधुरम।।
यानी मधुरता के स्वामी श्री कृष्ण का सब कुछ मधुर है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, महाप्रभु वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित 'मधुराष्टकम्' के ये शब्द मन को असीम शांति प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जब हम ईश्वर को प्रेम की दृष्टि से देखते हैं, तो हमें उनकी हर लीला और हर रूप में केवल मिठास ही नजर आती है।
जय श्री कृष्णा 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
🔴🌺कर्म, करुणा और आशीर्वाद की अद्भुत कथा ✨💮
एक दिन Narada अपनी वीणा बजाते हुए “नारायण… नारायण…” जपते हुए वैकुंठ की ओर जा रहे थे।
मार्ग में उन्हें एक स्त्री दिखाई दी—चेहरा उदास, आँखों में गहरा शून्य।
वह विनम्र स्वर में बोली—
“मुनिवर… मेरी गोद आज तक सूनी है। आप तो प्रभु से मिलते हैं… उनसे पूछिए न, मेरे भाग्य में संतान सुख कब आएगा?”
नारदजी ने दया से उसकी ओर देखा और कहा—
“ठीक है माता, मैं अवश्य पूछूँगा।”
वे आगे बढ़े और वैकुंठ पहुँचकर Vishnu से मिले।
भगवान ने स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया—
“आओ नारद, सब कुशल तो है?”
नारद बोले—
“प्रभु, एक स्त्री मिली थी… अत्यंत दुखी थी… पूछ रही थी कि उसे संतान कब प्राप्त होगी?”
भगवान का मुख गंभीर हो गया।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—
“नारद, उसके भाग्य में संतान का योग नहीं है। उसे यही कह देना।”
नारदजी वापस लौटे।
वह स्त्री दौड़ती हुई उनके पास आई, आँखों में आशा चमक रही थी—
“मुनिवर, क्या कहा प्रभु ने?”
नारदजी ने कठोर सत्य सुना दिया—
“माता… तुम्हें संतान सुख नहीं मिलेगा।”
यह सुनते ही उसका संसार जैसे टूट गया।
वह रोती रह गई और नारदजी आगे बढ़ गए।
कुछ समय बीता…
एक दिन उसी गाँव में एक साधु आया।
वह पुकार रहा था—
“जो मुझे एक रोटी देगा, मैं उसे एक उत्तम संतान का आशीर्वाद दूँगा।”
वही स्त्री तुरंत उठी, प्रेम से रोटी बनाई और साधु को अर्पित कर दी।
साधु ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया—
“तुम्हारी गोद अवश्य भरेगी।”
समय बीता… और आश्चर्य!
उसके घर में एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।
जहाँ पहले सन्नाटा था, वहाँ अब हँसी और किलकारियाँ गूँजने लगीं।
वर्षों बाद नारदजी फिर वहाँ से गुज़रे।
उन्होंने उस स्त्री को बच्चे के साथ प्रसन्न देखा तो चकित रह गए।
स्त्री ने मुस्कुराते हुए कहा—
“मुनिवर, आपने कहा था कि मुझे संतान नहीं मिलेगी… पर एक साधु के आशीर्वाद से यह पुत्र मिला है।”
नारदजी आश्चर्य में पड़ गए।
वे तुरंत वैकुंठ पहुँचे और भगवान से प्रश्न किया—
“प्रभु, आपने तो कहा था कि उसके भाग्य में संतान नहीं है… फिर यह कैसे संभव हुआ?”
भगवान ने सीधे उत्तर न देकर कहा—
“नारद, मुझे एक औषधि चाहिए। भूलोक से एक कटोरी मानव रक्त ले आओ।”
नारदजी पृथ्वी पर आए, अनेक लोगों से निवेदन किया, पर कोई तैयार नहीं हुआ।
सबने उपहास ही किया।
थके-हारे वे जंगल पहुँचे, जहाँ वही साधु मिला।
नारदजी ने अपनी समस्या बताई।
साधु ने बिना एक पल गँवाए कहा—
“लीजिए…”
और तुरंत अपने शरीर से रक्त निकालकर कटोरी भर दी।
नारद स्तब्ध रह गए।
वह रक्त लेकर वैकुंठ पहुँचे।
भगवान ने कहा—
“नारद, यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।
जिस साधु ने मेरे लिए अपना रक्त देने में एक क्षण भी नहीं सोचा…
क्या उसके सच्चे आशीर्वाद से मैं किसी का भाग्य नहीं बदल सकता?”
फिर भगवान बोले—
“भाग्य केवल लिखी हुई रेखा नहीं है…
यह बदलता है—
सच्चे प्रेम से,
निःस्वार्थ सेवा से,
और त्याग से।”
सार:
मनुष्य का जीवन केवल प्रारब्ध से नहीं चलता।
उसके कर्म, उसकी करुणा, और दूसरों के लिए किया गया त्याग—
उसके भाग्य को भी बदलने की शक्ति रखते हैं।
✨🌺नारायण नारायण🥀🌻 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
. “ज्ञान का घमण्ड”
गंगा को पार करने के लिए कई विद्वान नाव में सवार हुए। नाव धीरे-धीरे विद्वानों को लेकर किनारे की तरफ बढ़ रही थी। उनमें से एक विद्वान ने नाविक से पूछा– ‘क्या तुम पढ़े लिखे हो?’
नाविक ने कहा– ‘कैसी पढ़ाई लिखाई साहब, बस मुझे तो यह नाव चलानी आती है।’
विद्वान ने नाविक से पूछा– ‘क्या तुमने कभी भूगोल पढ़ा है?’
नाविक ने कहा– ‘यह भूगोल क्या होता है?’
विद्वान ने अपनी विद्या का प्रदर्शन करते हुए भला तुम्हें कैसे पता होगा तुम्हारी तो एक चौथाई जिन्दगी पानी में ही गुजर गयी।
इसके बाद दूसरे विद्वान ने नौका वाले से एक और प्रश्न किया– ‘इतिहास के बारे में जानते हो थोड़ा बहुत! बताओ बाबर कौन था?’
नाविक ने अपनी अज्ञानता जाहिर करते हुए कहा– ‘मुझे इसकी भी जानकारी नहीं है।’
विद्वान ने कहा– ‘फिर तो तुम्हारी आधी जिन्दगी ही पानी में बर्बाद हो गयी।’
इसके बाद विद्या के अभिमान में चूर हुए विद्वान ने एक और प्रश्न नाविक से पूछा– ‘रामायण और महाभारत के बारे में तो जानते होंगे?’
बेचारा नाविक क्या कहता उसने इशारे में ना कहा। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। तभी विद्वान मुस्कराते हुए बोला– ‘फिर तो तुम्हारी सारी जिन्दगी पानी में ही बर्बाद हो गयी है।
कुछ देर बाद अचानक गंगा में पानी का बहाव तेज होने लगा नाविक ने सभी नाव में सवार विद्वानों को तूफान के आने की चेतावनी दी।
नाविक ने सभी विद्वानों से कहा– ‘बहुत तेज तूफान आने वाला है और यह नाव कभी भी डूब सकती है। क्या आप सभी को तैरना आता है?’
सभी विद्वानों ने घबराते हुए एक साथ बोला नहीं-नहीं हमें तैरना नहीं आता।’
नाव चलाने वाले ने स्थिति को भांपते हुए कहा– ‘अब तो महाशय आप लोगों की सारी जिन्दगी पानी में ही चली जायेगी।’
कुछ ही देर में तेज तूफान आने से नाव डूबने लगी नाविक तेजी से पानी कूद गया और तैरता-तैरता किनारे तक पहुँच गया परन्तु सभी विद्वान पानी में बह कर डूब गए।
ज्ञान वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। कुछ लोग ज्ञान के अभिमान में इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों के साथ अपने ज्ञान का घमण्ड करने लगते हैं।
० ० ०
जय जय श्री राधे🏵️🌺 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
सूर्यपुत्र, कर्मफल दाता, भगवान शनिदेव की कृपा हम सब पर बनी रहे। वे हमें धैर्य, अनुशासन और सच्चाई के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
जय शनिदेव!🙏
शनिदेव डराते नहीं, वे केवल हमारे कर्मों का दर्पण दिखाते हैं। अच्छे कर्म करते रहिए, न्याय के देवता सदैव आपका साथ देंगे।
मंत्र:
"नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥"
जय हो शनिदेव जी महाराज 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
शुभ शनिवार, जय बजरंगबली 🚩
पवन तनय संकट हरन ; मंगल मूरती रूप। राम लखन सीता सहित। हृदय बसहु सुर भूप।
प्रभु हनुमान जी की कृपा से
आपका दिन साहस, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहे।
हर संकट दूर हो,
और जीवन में सफलता का प्रकाश बना रहे।
जय श्री राम • जय हनुमान 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
वन की नीरवता में एक शांत अग्नि धधक रही थी—धीमी, उज्ज्वल और साक्षी उस दिव्य संवाद की, जहाँ भगवान शिव और माता अन्नपूर्णा जीवन के गहरे सत्य को प्रकट कर रहे थे।
एक बार महादेव ने जगत को समझाया कि यह संपूर्ण संसार माया है—यहाँ तक कि अन्न भी। जब यह बात माता पार्वती ने सुनी, तो उनके हृदय में एक प्रश्न उठा—“यदि अन्न ही माया है, तो जीवों का पालन कैसे होगा?”
इस विचार से उन्होंने अन्न की शक्ति को ही संसार से विलुप्त कर दिया।
क्षण भर में ही सृष्टि में भूख और त्राहि-त्राहि का माहौल छा गया। देवता हों या मनुष्य—सब व्याकुल हो उठे। तब महादेव को अपनी वाणी का वास्तविक अर्थ समझ में आया।
वे काशी पहुँचे, एक साधारण भिक्षुक के रूप में। वहीं माता पार्वती माता अन्नपूर्णा बनकर प्रकट हुईं—अन्न की अधिष्ठात्री देवी।
उस पावन क्षण में माता ने स्वयं अपने हाथों से शिव को अन्न परोसा।
तभी शिव ने स्वीकार किया—
“अन्न केवल भोजन नहीं, यह स्वयं देवी शक्ति का प्रसाद है। यही जीवन का आधार है।”
यह लीला हमें एक गहरी शिक्षा देती है—
संहार के देवता भी जब अन्न के महत्व को समझते हैं, तो विनम्र हो जाते हैं, और माता अन्नपूर्णा सृष्टि का पालन करती हुई करुणा का स्वरूप बन जाती हैं।
✨🔥 संदेश:
अन्न केवल पेट भरने का साधन नहीं, यह ईश्वर की कृपा है। जिस घर में अन्न का आदर होता है, वहाँ समृद्धि और शांति स्वतः निवास करती है।
🙏 स्तोत्र:
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
माता अन्नपूर्णा हमें अन्न के साथ-साथ ज्ञान, संतोष और कृपा भी प्रदान करती हैं। हर अन्न का कण प्रसाद है—उसे सम्मान और कृतज्ञता से ग्रहण करना ही सच्ची भक्ति है। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
कन्याकुमारी मंदिर का रहस्य : देवी की नथ की चमक और बंद समुद्री द्वार की अद्भुत कथा :-
कन्याकुमारी मंदिर के समुद्री द्वार को बंद रखने के पीछे की कहानी बड़ी ही रोचक और चमत्कारिक है। यह कहानी देवी की उस दिव्य नथ से जुड़ी है, जिसकी चमक आज भी पूरी दुनिया में मशहूर है।
कहा जाता है कि माता कन्याकुमारी की प्रतिमा की नाक में जड़ी हीरे की नथ बहुत ही अलौकिक है। प्राचीन काल में जब लाइटहाउस (प्रकाश स्तंभ) नहीं होते थे, तब समुद्र में चलने वाले जहाजों के लिए यह नथ ही मार्गदर्शक का काम करती थी।
मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में समुद्र की ओर खुलता था। हीरे की चमक इतनी तेज और चमकदार थी कि रात के अंधेरे में समुद्र के बीच से आने वाले नाविकों को लगता था कि वह किसी टापू या किनारे का लाइटहाउस है।
इस भ्रम के कारण कई जहाज किनारे की ओर तेजी से आते और तट की नुकीली चट्टानों से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे।
समुद्री जहाजों को इन हादसों से बचाने के लिए मंदिर के उस पूर्वी द्वार को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। अब देवी की प्रतिमा का दर्शन केवल उत्तरी द्वार से ही होता है। साल में केवल कुछ विशेष अवसरों (जैसे कि आराट्टु उत्सव) पर ही इस द्वार को खोला जाता है।
इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने होते हैं, जो दक्षिण भारतीय मंदिरों की एक पवित्र परंपरा है।
यदि आप देवी की प्रतिमा को ध्यान से देखेंगे, तो उनके हाथ में एक माला है। वह आज भी भगवान शिव के साथ विवाह की प्रतीक्षा में तपस्या की मुद्रा में खड़ी हैं।
कन्याकुमारी दुनिया की उन दुर्लभ जगहों में से एक है जहाँ आप एक ही स्थान पर खड़े होकर समुद्र से सूर्योदय होते हुए और समुद्र में ही सूर्यास्त होते हुए देख सकते हैं। विशेष रूप से चैत्र पूर्णिमा के दिन, आप एक तरफ सूरज को ढलते और दूसरी तरफ चांद को निकलते हुए देख सकते हैं। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
नवगुंजरा, जब अर्जुन को मिला श्रीकृष्ण का अद्भुत विश्वरूप :
यह कथा तब की है जब पांडव वनवास में थे। अर्जुन मणिपुर की पहाड़ियों पर तपस्या कर रहे थे। एक दिन अचानक उनके सामने एक ऐसा जीव प्रकट हुआ जिसे देखकर वे चकित रह गए। उस जीव के नौ अंग अलग-अलग प्राणियों के थे यानी सिर मुर्गे का, गर्दन मोर की, पीठ कूबड़ वाले बैल की, कमर शेर की, पूँछ साँप की, पैर हाथी, बाघ और घोड़े के (तीन पैर), हाथ मनुष्य का (जिसमें उसने कमल का फूल पकड़ा था)
अर्जुन पहले तो डरे, फिर उन्होंने अपना गांडीव धनुष उठा लिया। उन्हें लगा कि यह कोई मायावी राक्षस है। लेकिन जैसे ही उन्होंने ध्यान से देखा, उन्होंने महसूस किया कि इतनी विषमताओं के बाद भी उस जीव में एक दिव्य संतुलन और शांति थी। अर्जुन को समझ आया कि प्राकृतिक रूप से ऐसा जीव संभव नहीं है, यह अवश्य ही चराचर जगत के स्वामी की कोई लीला है।
उन्होंने धनुष नीचे रखा और उस अद्भुत रूप के चरणों में झुक गए। तभी वह रूप विलीन हो गया और भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए।
नवगुंजरा केवल एक विचित्र जीव नहीं है बल्कि यह श्रीकृष्ण के विश्वरूप का एक संक्षिप्त और कलात्मक रूप है।
यह रूप संदेश देता है कि ईश्वर केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों, रेंगने वाले जीवों और संपूर्ण प्रकृति में समाया है। ओडिशा की पट्टचित्र चित्रकला में नवगुंजरा एक प्रमुख विषय है। यहाँ तक कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और गंजीफा (ताश के खेल) के कार्ड्स में भी नवगुंजरा का चित्रण मिलता है।
यह कथा सिखाती है कि ज्ञान का अर्थ केवल वह नहीं जो हम जानते हैं, असली ज्ञान वह है जो हमें अनजान और विचित्र में भी दिव्यता देखने की दृष्टि दे।
ओडिशा के कई मंदिरों की दीवारों पर आप आज भी नवगुंजरा की नक्काशी देख सकते हैं। इसे विश्वरूप का एक प्रतीकात्मक स्वरूप माना जाता है जो यह याद दिलाता है कि सृष्टि का हर कण, चाहे वह कितना भी भिन्न क्यों न दिखे, अंततः एक ही ऊर्जा से संचालित है। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️














