देवी छिन्नमस्ता जयंती
हिंदी पंचांग के अनुसार बैशाख महीने में एक की शुक्ल चतुर्दशी को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। वहीं गुप्त नवरात्रि में भी मां छिन्नमस्ता की पूजा-उपासना की जाती है। सनातन शास्त्र में मां को सवसिद्धि पूर्ण करने वाली अधिष्ठात्री कहा जाता है। मां की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही गुप्त नवरात्रि के दौरान भी मां छिन्नमस्ता की पूजा उपासना का विधान है। अत: तंत्र-मंत्र सीखने वाले साधक गुप्त नवरात्रि में भी मां छिन्नमस्ता की कठिन भक्ति करते हैं। ये दस महाविद्याओं की छठी देवी हैं। सनातन शास्त्र में मां छिन्नमस्ता को सर्व सिद्धि पूर्ण करने वाली अधिष्ठात्री कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं तत्काल पूर्ण होती हैं। इसके लिए साधक श्रद्धा भाव से मां छिन्नमस्ता की पूजा, जप एवं तप करते हैं। छिन्नमस्तिका देवी को मां चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है. देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है. मार्कंडेय पुराण व शिव पुराण आदि में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है इनके अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया। दैत्यों को परास्त करके देवों को विजय दिलवाई तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा. परंतु देवी की सहायक योगिनियाँ अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत नहीँ हो पाई थी इस पर उनकी रक्त पिपासा को शांत करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई जिस कारण माता को छिन्नमस्तिका नाम से भी पुकारा जाने लगा। माना जाता है की जहां भी देवी छिन्नमस्तिका का निवास हो वहां पर चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी हो. इस बात की सत्यता इस जगह से साबित हो जाती हैं क्योंकी मां के इस स्थान के चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी है. यहां पर कालेश्वर महादेव व मुच्कुंड महादेव तथा शिववाड़ी जैसे शिव मंदिर स्थापित हैं। छिन्नमस्ता के प्राद्रुभाव की एक कथा इस प्रकार है- भगवती भवानी अपनी दो सहचरियों के संग मन्दाकिनी नदी में स्नान अक्र रही थी. स्नान करने पर दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख लगी. भूख कि पीडा से उनका रंग काला हो गया. तब सहचरियों ने भोजन के लिये भवानी से कुछ मांगा. भवानी के कुछ देर प्रतिक्षा करने के लिये उनसे कहा, किन्तु वह बार-बार भोजन के लिए हठ करने लगी। तत्पश्चात सहचरियों ने नम्रतापूर्वक अनुरोध किया - "मां तो भूखे शिशु को अविलम्ब भोजन प्रदान करती है" ऎसा वचन सुनते ही भवानी ने अपने खडग से अपना ही सिर काट दिया. कटा हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली. दो धाराओं को उन्होंने सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया. जिन्हें पान कर दोनों तृ्प्त हो गई. तीसरी धारा जो ऊपर की प्रबह रही थी, उसे देवी स्वयं पान करने लगी. तभी से वह छिन्नमस्तिका के नाम से विख्यात हुई है। छिन्नमस्तिका पूजा की सिद्धि के तुरंत बाद परिणाम का एहसास होता है. माँ छिन्नमस्ता की पूजा से समृद्धि, स्थिरता और लंबे जीवन के साथ साथ और भी अनगिनत लाभ होते है. छिन्नमस्तिका मंत्र कुंडलिनी जागरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कुंडलिनी योग माँ के अभ्यास के दौरान मूला धरा चक्र के जागरण के लिए छिन्नमस्तिका मंत्र का जाप किया जाता है।
#शुभ कामनाएँ 🙏