वेदांत वास्तु ज्योतिष
426 views
13 hours ago
#शुभ मंगलवार #ज्योतिष वास्तु यंत्र मंत्र तंत्र #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 ग्रह वास्तव में पीड़ा देते हैं???🌹 एक बार पढ़िए जरूर।। +++++++++++++++++++++++++++++++++++ ♻️जब जीवन में एक के बाद एक बाधाएँ आने लगती हैं, परिश्रम के अनुरूप फल नहीं मिलता, विवाह में विलंब होने लगता है, संतान पक्ष चिंता का कारण बनता है, धन आता तो है पर टिकता नहीं, अथवा मन बिना किसी स्पष्ट कारण के अशांत रहने लगता है, तब अधिकांश लोग एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, "मेरे ग्रह खराब चल रहे हैं।" कोई शनि को दोष देता है, कोई राहु को, कोई केतु को और कोई अपनी पूरी कुंडली को ही अशुभ मान बैठता है। किंतु वैदिक ज्योतिष का विद्यार्थी जैसे जैसे शास्त्रों की गहराई में प्रवेश करता है, उसे ज्ञात होने लगता है कि ग्रहों को लेकर समाज में जितनी धारणाएँ प्रचलित हैं, उनमें से अनेक अधूरी हैं। महर्षि पराशर, वराहमिहिर, कल्याणवर्मा तथा वैद्यनाथ दीक्षित जैसे आचार्यों ने कहीं भी ग्रहों को मनुष्य का शत्रु नहीं कहा। ग्रह ईश्वर की उस सूक्ष्म व्यवस्था के अंग हैं जिनके माध्यम से जीव अपने संचित, प्रारब्ध और वर्तमान कर्मों का फल प्राप्त करता है। अतः यह कहना कि ग्रह पीड़ा देते हैं, वैसा ही है जैसे दर्पण को कुरूपता का कारण मान लेना। दर्पण केवल प्रतिबिंब दिखाता है, उसी प्रकार ग्रह केवल कर्मों का प्रतिबिंब दिखाते हैं।। 🍁ज्योतिष में किसी ग्रह का फल केवल उसके नाम से निर्धारित नहीं होता। यह विचार कि बृहस्पति सदैव शुभ होगा और शनि सदैव अशुभ होगा, शास्त्रीय दृष्टि से पूर्ण सत्य नहीं है। ग्रह किस भाव में स्थित है, किस राशि में है, किस नक्षत्र में है, उस नक्षत्र का स्वामी कौन है, ग्रह कितने अंशों पर स्थित है, अस्त है या वक्री, शुभ दृष्टि में है या पाप प्रभाव में, यह सब देखे बिना फलादेश करना अंधकार में तीर चलाने के समान है। अनेक बार देखा जाता है कि बृहस्पति जैसे स्वभाव से शुभ ग्रह अष्टम अथवा द्वादश भाव में जाकर, अथवा पीड़ित नक्षत्र स्वामी के अधीन होकर अपेक्षित शुभ फल नहीं दे पाते। दूसरी ओर शनि, मंगल अथवा राहु जैसे ग्रह यदि बलवान होकर केंद्र या त्रिकोण में स्थित हों, योगकारक बन जाएँ और शुभ ग्रहों का सहयोग प्राप्त करें, तो वही ग्रह व्यक्ति को साधारण अवस्था से उठाकर विशिष्ट स्थान तक पहुँचा देते हैं। इसलिए शास्त्र ग्रह का नहीं, ग्रह की स्थिति का निर्णय करते हैं।। 🍁नक्षत्रों की भूमिका तो और भी सूक्ष्म है। राशि शरीर है तो नक्षत्र उसकी चेतना है। कोई ग्रह जिस नक्षत्र में बैठता है, वह अपने फल का बड़ा भाग उस नक्षत्र स्वामी के माध्यम से देता है। यही कारण है कि एक ही राशि में स्थित दो व्यक्तियों के ग्रह भिन्न परिणाम देते हैं। उदाहरणार्थ, यदि शुक्र शुभ भाव में स्थित हो किंतु उसका नक्षत्र स्वामी पीड़ित हो, तो दांपत्य, सुख और वैभव में बाधाएँ आ सकती हैं। इसके विपरीत यदि शनि किसी शुभ नक्षत्र स्वामी के अधीन हो, तो उसकी कठोरता में भी रचनात्मकता दिखाई देती है। इसी प्रकार ग्रह की डिग्री अर्थात अंशबल भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाल्यावस्था, वृद्धावस्था, संधि अंश, अस्त अवस्था और वक्रत्व ग्रह के फल को परिवर्तित कर देते हैं। यही कारण है कि अनुभवी ज्योतिषी केवल ग्रहों की संख्या नहीं गिनता, वह ग्रहों की अवस्था को पढ़ता है।। ज्योतिषाचार्य नवरत्न वत्स के अनुसार राहु, शनि और केतु की महादशा को लेकर सबसे अधिक भय फैलाया जाता है। जैसे ही किसी व्यक्ति को ज्ञात होता है कि शनि महादशा अथवा राहु महादशा आरंभ होने वाली है, वह मान लेता है कि अब जीवन में केवल संघर्ष ही शेष है। किंतु यदि ऐसा होता, तो जिन लोगों ने शनि महादशा में साम्राज्य स्थापित किए, उच्च पद प्राप्त किए, अथाह संपत्ति अर्जित की और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त की, उनके जीवन को कैसे समझा जाएगा? सत्य यह है कि कोई भी महादशा अपने आप में न शुभ होती है और न अशुभ। वह वही फल देती है जिसका बीज जन्मकुंडली में पहले से विद्यमान होता है। बलवान शनि व्यक्ति को अनुशासन, धैर्य, स्थिरता और कर्मनिष्ठा प्रदान करता है। सशक्त राहु असाधारण अवसर, विदेशी संबंध, आधुनिक क्षेत्रों में सफलता और सामाजिक प्रतिष्ठा दे सकता है। अनुकूल केतु आध्यात्मिक उन्नति, अंतर्दृष्टि और वैराग्य प्रदान कर सकता है। हाँ, यदि ये ग्रह पीड़ित हों, दुर्बल हों अथवा अशुभ संबंधों में हों, तब इनके कालखंड संघर्षपूर्ण हो सकते हैं, किंतु संघर्ष और विनाश दोनों समानार्थी नहीं हैं।। 🍁यदि किसी जातक के जीवन में बार बार एक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हों, विवाह में बाधा, व्यवसाय में अवरोध, धनहानि, न्यायालयी विवाद, मानसिक अशांति अथवा स्वास्थ्य संबंधी कष्ट निरंतर बने हुए हों, तो उसे इसे केवल दुर्भाग्य मानकर नहीं छोड़ देना चाहिए। जिस प्रकार शरीर में रोग उत्पन्न होने पर व्यक्ति चिकित्सक के पास जाता है, परीक्षण कराता है और औषधि ग्रहण करता है, ज्योतिषाचार्य नवरत्न वत्स बताते हैं उसी प्रकार ग्रहजनित पीड़ाओं का परीक्षण भी आवश्यक है। अनुभवी चिकित्सक शरीर की नाड़ी पहचानता है और अनुभवी ज्योतिषी ग्रहों की। शास्त्रों ने इसलिए मंत्रजप, दान, हवन, देवपूजन, रुद्राक्ष धारण, व्रत, सेवा तथा सदाचार का विधान किया है। ये केवल धार्मिक परंपराएँ नहीं, बल्कि ग्रहों की प्रतिकूलता को संतुलित करने वाली आध्यात्मिक औषधियाँ हैं। जैसे उचित औषधि रोग की तीव्रता कम कर देती है, वैसे ही शास्त्रोक्त उपाय ग्रहों के कठोर प्रभाव को सौम्य बना सकते हैं।। 🍁🌿अतः यह समझना आवश्यक है कि ग्रह हमारे विरोधी नहीं हैं। शनि दंड देने नहीं आता, कर्मों का बोध कराने आता है। राहु भ्रम में डालने नहीं, भ्रम को उजागर करने आता है। केतु छीनने नहीं, अनावश्यक आसक्ति से मुक्त कराने आता है। ज्योतिष का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, चेतना जागृत करना है। जो व्यक्ति ग्रहों को दोष देता है, वह भाग्य के अंधकार में भटकता रहता है, किंतु जो व्यक्ति ग्रहों के संकेतों को समझ लेता है, उसके लिए ज्योतिष भविष्य जानने का माध्यम नहीं, स्वयं को जानने का दिव्य शास्त्र बन जाता है।। एक सामान्य जानकारी ज्योतिष कोई परमात्मा नहीं आपका मार्ग दर्शक है