#जय श्री कृष्ण
जब भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया, तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन के लिए नंदगाँव पहुँचे। शनिदेव भी अपने आराध्य के दर्शन के लिए आए, लेकिन माता यशोदा ने उन्हें कृष्ण को देखने से मना कर दिया।
माता यशोदा को भय था कि शनिदेव की "क्रूर दृष्टि" से उनके लला (कृष्ण) का अनिष्ट हो जाएगा। शनिदेव अत्यंत दुखी हुए और पास के एक घने जंगल में जाकर तपस्या करने लगे। उन्होंने भगवान कृष्ण को पुकारते हुए कहा, "प्रभु! मैं तो केवल अपना कर्तव्य (न्याय) करता हूँ, फिर मुझे आपके दर्शनों से वंचित क्यों किया जा रहा है?"
शनिदेव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें कोयल (कोकिल) के रूप में दर्शन दिए। कृष्ण ने शनिदेव को आशीर्वाद दिया कि "आज से इस वन का नाम कोकिलावन होगा। जो भक्त यहाँ आकर आपकी पूजा करेगा, उसे मेरी भी कृपा प्राप्त होगी।"
कृष्ण ने शनिदेव को न्याय का देवता और अपना परम भक्त घोषित किया। भगवान ने बताया कि जो व्यक्ति शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाता है, दीप जलाता है और गरीबों की सेवा करता है, शनिदेव उसे कभी दंडित नहीं करते बल्कि उसके रक्षक बन जाते हैं। इस कथा के अनुसार, शनिदेव का व्रत रखने से व्यक्ति के मानसिक संताप दूर होते हैं और भगवान कृष्ण की कृपा भी स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।