किसानों मजदूरों को भले न मालूम हो लेकिन जमींदारों, राजे-रजवाड़ों, नवाबों (सामन्तों) को पता है कि भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाने में लेनिन का बहुत बड़ा वैचारिक योगदान रहा है। कम्युनिस्टों की वजह से सामंतों और बड़े-बड़े पूँजीपतियों का जीना हराम हो गया था। आज भी वे इस विचारधारा से डरें हुए हैं। उन्हें पता है कि भारत में एक-एक इंच जमीन अगर कहीं किसानों को बांटी गई है, या पट्टे पर दी गयी है या खरीदने का अधिकार मिला है, उसमें क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों का बड़ा योगदान है। वरना तीन पीढ़ी पहले सारी जमीन जमींदारों, राजे-रजवाड़ों, नवाबों की थी। तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह के ताप से डरकर जमींदारी उन्मूलन कानून लागू करके कुछ हद तक जमींदारी उन्मूलन करना पड़ा। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह, श्रीकाकुलम किसान विद्रोह और छिटपुट सैकड़ों किसान विद्रोह क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों ने किया है। लाखों कुर्बानियां दी हैं। तब जमीन का कुछ टुकड़ा मिला। "जो जमीन को जोते बोवे वो जमीन का मालिक होवे।" कम्युनिस्टों का ही नारा था। इन आन्दोलनों के ताप से ही सरकारों ने कुछ किसानों को थोड़ा-बहुत पट्टा वगैरह दिया।
अगर आप घंटे काम का कानून बनाना पड़ा था तो उसके पीछे इसी विचारधारा के लोगों की प्रमुख भूमिका रही है।
इसके अलावा अमेरिकी साम्राज्यवाद के न चाहते हुए भी भारत में जो अनेकों बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों एवं कल-कारखानों से लेकर भारत को एक परमाणु सम्पन्न देश बनाने तक में बहुत बड़ा योगदान लेनिन के सोवियत संघ का ही है।
मजदूर भले न समझता हो मगर दुनिया भर के फासिस्ट लेनिन के विचारों से डरते हैं।
लेनिन की मूर्ति तोड़ने में जिन शोषक वर्गों का हाथ है वे वास्तव में मेहनतकश जनता के दुश्मन रहे हैं और लेनिन मेहनतकश जनता के मसीहा। इसीलिए वे लेनिन की मूर्ति को तोड़कर अपनी दुश्मनी का इजहार कर रहे हैं।
*रजनीश भारती*
*जनवादी किसान सभा*
#संविधान बचाओ अभियान
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#तर्कशील बने अंधभक्त नहीं
#👫अंधविश्वास भगाओ देश बचाओ 👫
#भारत के पिछड़ेपन का कारण मनुवाद है