*खामनेई की हत्या : अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर के पतन का आगाज*
आप खामनेई की मौत पर आंसू बहा रहे हैं या जश्न मना रहे हैं, आपकी सहानुभूति ईरान के पक्ष में है या आप अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर के पक्ष में खड़े हैं? आदमी के पक्ष में हैं या जानबूझकर आदमखोरों के पक्ष में खड़े हैं? मुझे नहीं मालूम मगर मुझे पता है कि आज दुनिया की अधिकांश आबादी नरपिशाचों को अपना हीरो मान बैठी है। परन्तु यह आँकड़ा अब बदलने जा रहा है।
मिडिल ईस्ट एक अखाड़ा बना हुआ है। इसमें दो पहलवान लड़ रहे हैं। एक तरफ छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार करने वाले उन्हें मारकर उनका खून पीने वाले, उनकी आँखें, किडनी, लीवर आदि अंगों की तस्करी करने वाले, उनके मांस को पकाकर खाने वाले सैकड़ों साल से कमजोर पिछड़े देशों की जनता का खून चूसने के लिए मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी, जुआखोरी, मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाले, जाति धर्म के नाम पर जनता को जनता से लड़ाने वाले नरपिशाच दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ ढकेलने की कोशिश कर रहे हैं। ये नरपिशाच बड़े-बड़े बैंकों और बड़े-बड़े उद्योगों के एकाधिकारवादी मालिक हैं, वे अपनी वित्तीय पूँजी के बल पर पिछड़े देशों की जनता के खिलाफ असमान समझौता करके पूरी दुनिया की जनता का खून निचोड़ कर खुद अय्याशी मक्कारी कर रहे हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर ही दुनिया भर के साम्राज्यवादियों का नेता है और ट्रम्प इन नरपिशाचों का राजनीतिक मुखौटा है। भारत समेत कई पिछड़े हुए देशों के बड़े पूंजीपति और सामंती ताकतों ने भी भी इन्हीं नरपिशाचों के साथ गठबंधन बना लिया है।
इस अखाड़े में दूसरी तरफ चीन है, जो अपने विराट पैमाने के समाजवादी उद्योगों के बल पर पूरी दुनिया को सस्ते माल सुलभ करा रहा है। और आज पूरी दुनिया के विकास का इंजन बना हुआ है। वह अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर को हर मामले में कड़ी टक्कर दे रहा है। अमेरिका दुनिया भर में फैले अपने 800 से अधिक फौजी अड्डों के बल पर चीन की घेरेबंदी कर रहा है तो चीन दुनिया की सबसे बड़ी परियोजना ‘बेल्ट एण्ड रोड’ के जरिए अमेरिकी घेरेबंदी को तोड़ रहा है। आज करीब डेढ़ सौ से अधिक देश बेल्ट एण्ड रोड महापरियोजना से जुड़ चुके हैं।
जहां अमेरिकी सुपर पावर अपनी गिरावट को रोकने के लिए पिछड़े देशों के खिलाफ दादागिरी करता है और हिंसक हस्तक्षेप करता है, लेकिन यह उसके आंतरिक विरोधाभासों को और तीव्र करता है, जनता के प्रतिरोध को जन्म देता है और वैश्विक स्तर पर उसके अलग-थलग पड़ने की प्रक्रिया को तेज करता है। वहीं चीन अपने सस्ते मालों और सूद विहीन कर्ज एवं अनुदान के जरिए पिछड़े देशों की मदद कर रहा है और उन देशों की जनता से मित्रता बढ़ा रहा है। जहां अमेरिकी सुपर पावर अपनी आवारा वित्तीय पूँजी का निर्यात करके तीसरी दुनिया के देशों को गुलाम बना रहा है वहीं चीन श्रम का निर्यात करके तीसरी दुनिया के देशों को आत्मनिर्भर बना रहा है। इसी तरह सभी मामलों में चीन और अमेरिका की रणनीतियों में बुनियादी अन्तर है।
ब्रिक्स का विस्तार, ब्रिक्स करेंसी और पतन की ओर डालर का वर्चस्व, अमेरिका के न चाहते हुए भी चीन की तकनीकों, अर्धतैयार मालों और रेयर अर्थ मैटेरियल आदि पर बढ़ती अमेरिकी उद्योगों की निर्भरता… अमेरिका बौखला गया है।
साम्राज्यवादी नरपिशाचों ने चीन की घेरेबंदी करने के लिए श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, सीरिया… आदि देशों में बलपूर्वक तख्तापलट करवाकर चीन से मित्रवत सम्बन्ध रखने वाली सरकारों को गिरा दिया और अपने पिट्ठुओं की सरकार बनवायी है। हमारे देश में तो पहले से ही अमेरिकी पिट्ठुओं की सरकार चल रही है। इन नरपिशाचों ने पिछले महीने तीन जनवरी को वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण कर लिया है, और 28 फरवरी को युद्ध की घोषणा किए बगैर, चौथे राउंड की वार्ता से पहले ही ईरान पर अचानक हमला करके उसके सुप्रीम लीडर खामनेई और कई बड़े नेताओं की हत्या कर दी।
इन तरीकों से अमेरिका तीसरे विश्वयुद्ध के लिए चीन को ललकार रहा है मगर चीन बहुत खामोशी से इसका जवाब दे रहा है। आज चीन के हथियारों और तकनीकी सहायता के बल पर ही अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर के मुकाबले ईरान न सिर्फ टिका हुआ है, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की नाक में दम कर रखा है।
ट्रम्प ने सोचा था कि खामनेई की मौत के बाद ईरान की जनता विद्रोह पर उतर आयेगी और तख्तापलट करेगी और ईरान में अमेरिका के पिट्ठुओं की सरकार बनेगी। मगर उसका सारा दांव उल्टा पड़ गया। नेता की हत्या से व्यवस्था नहीं बदलती, बल्कि जन प्रतिरोध मजबूत होता है। ऐसी हत्याएं जनता को संगठित करती हैं और साम्राज्यवाद के खिलाफ लंबे संघर्ष को जन्म देती हैं। ऐसी कार्रवाइयों से वह सफल नहीं हो सकता क्यों कि साम्राज्यवादी आक्रामकता विरोधाभासों को तीव्र करती है, जो साम्राज्यवाद की कब्र खोदती है। अमेरिका के लिए यह खतरनाक है क्योंकि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को तेज करने का बहाना मिल गया है।
ईरान ने बदला लेने के लिए हमला तेज कर दिया है। सऊदी अरब, कतर, बहरेन, कुवैत… जिन-जिन देशों में अमेरिकी फौजी अड्डे हैं उसे निशाना बनाया जा रहा है। अगर युद्ध लम्बा खिंचा तो एशिया में अमेरिकी फौजी अड्डे खत्म हो जायेंगे । ईरान युद्ध ने तेल की कीमतों को आसमान छूने पर मजबूर कर दिया है, जिससे सारी चीजों की मँहगाई बढ़ेगी, जिसका खामियाजा अमेरिका समेत दुनिया भर की मेहनतकश जनता को भुगतना पड़ेगा। अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ रही है। अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि एक "हमलावर" के रूप में मजबूत हो रही है, जो संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर उसके अलगाव को बढ़ा रही है। हिज़्बुल्लाह ने खामेनई की मौत के बदले इज़राइल पर हमले किए हैं, जिससे क्षेत्रीय युद्ध फैल रहा है। चीन का आर्थिक क्षमता, रूस की सैन्य क्षमता, और ईरान-रूस-चीन गठबंधन से — अमेरिका को चुनौती मिल रही है। खामेनई की हत्या ने इस गठबंधन को मजबूत किया है: रूस और चीन ने ईरान को सैन्य सहायता बढ़ाने की बात कही है, और हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में अमेरिकी जहाजों पर हमले तेज कर दिए हैं।
मौजूदा स्थिति में, ईरान को दुनिया की अधिकांश आबादी का समर्थन व सहानुभूति हासिल हो रही है जब कि इजरायल और अमेरिका की थू-थू हो रही है। इस घटना से अमेरिका के सैन्य फैलाव को उजागर कर रहा है। अमेरिका पहले से ही यूक्रेन और गाजा संकटों में फंसा है, और अब ईरान संघर्ष ने उसके संसाधनों को और खींच दिया है। यह हत्या अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकालिक में अराजकता पैदा करती है, जो अमेरिकी सहयोगियों (जैसे सऊदी अरब, यूएई) को प्रभावित करेगी। इससे अमेरिका की वैश्विक प्रतिष्ठा क्षतिग्रस्त हो रही है, क्योंकि रूस के पुतिन ने इसे "अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन" कहा है, चीन ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की कड़ी निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों व संयुक्त राष्ट्र चार्टर का गंभीर उल्लंघन तथा ईरान की संप्रभुता पर हमला बताया है। चीन ने इस कार्रवाई को "बर्बर" और अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध करार देते हुए क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की है, हालांकि इसे सीधे तौर पर 'युद्ध अपराध' के बजाय "संप्रभुता का उल्लंघन" कहा है।
यह घटना साम्राज्यवाद की गिरावट को तेज कर रही है, क्योंकि बहुध्रुवीय दुनिया में अमेरिका अब एकमात्र महाशक्ति नहीं रह गया—चीन और रूस जैसी शक्तियां इसका विरोध कर रही हैं, जो ब्रिक्स के माध्यम से डॉलर-आधारित अर्थव्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
इस हमले के बाद से परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि गैर-परमाणु देशों पर हमले उन्हें परमाणु हथियार बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
कुछ लोग तीसरे विश्वयुद्ध की आहट महसूस कर रहे हैं मगर अभी विश्वयुद्ध की संभावना दिख नहीं रही है। क्योंकि एक तो चीन बिना विश्वयुद्ध लड़े ही अमेरिका को परास्त करने की क्षमता रखता है दूसरे ईरान के ताबड़तोड़ जवाबी हमले से अमेरिका ने अन्दाज लगा लिया है कि विश्व युद्ध हुआ तो अमेरिका नेस्तनाबूद हो सकता है।
अमेरिकी साम्राज्यवादी सुपर पावर - मुर्दाबाद !!
*रजनीश भारती*
*जनवादी किसान सभा*
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