#राधे कृष्णा
श्रीकृष्ण का चूड़ीवाले (मणिहार) के वेश में श्रीराधा-दर्शन की अद्भुत लीला:
व्रज की रसपूर्ण लीलाओं में एक अत्यंत मधुर और भावमयी लीला वर्णित है, जिसमें स्वयं श्रीकृष्ण चूड़ी बेचने वाले (मणिहार) का वेश धारण करके बरसाना पहुँचते हैं। इस लीला का मुख्य उद्देश्य व्यापार नहीं, अपितु श्रीराधाजी के दर्शन तथा उनके प्रेम का आस्वादन करना था।
ध्यान रहे कि यह लीला मुख्यतः गौड़ीय एवं ब्रज-परंपराओं की लोककथाओं, पदावलियों और रस-ग्रंथों में प्रसिद्ध है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता, परन्तु भक्त-परंपरा में इसे अत्यन्त प्रेम से गाया जाता है।
लीला का प्रारम्भ::
एक दिन श्रीकृष्ण के मन में विचार आया—
आज किसी नवीन उपाय से राधा का दर्शन किया जाए।
वे जानते थे कि बरसाना में यों ही जाना सखियों की दृष्टि से बच पाना कठिन है। अतः उन्होंने एक सुंदर मणिहार (चूड़ी बेचने वाले) का वेश धारण किया।
सिर पर रंग-बिरंगी चूड़ियों की टोकरी, शरीर पर व्यापारी का वस्त्र, मुख पर हल्की दाढ़ी-मूँछ का श्रृंगार और मधुर स्वर में पुकारते हुए वे बरसाना की गलियों में पहुँचे—
"चूड़ी ले लो... सुंदर चूड़ी ले लो..."
सखियों का आश्चर्य
सखियों ने देखा कि आज कोई नया मणिहार आया है। उसकी वाणी इतनी मधुर है कि सुनते ही हृदय आकर्षित हो रहा है।
एक सखी ने पूछा—
"हे मणिहार! तुम्हारी चूड़ियाँ कितने मूल्य की हैं?"
मणिहार बने श्रीकृष्ण मुस्कराकर बोले—
"इन चूड़ियों का मूल्य धन नहीं है। जो इन्हें पहनेगा, उसे अपना हृदय देना होगा।"
सखियाँ हँसने लगीं। उन्हें कुछ संदेह भी हुआ कि यह कोई साधारण व्यापारी नहीं।
राधाजी का आगमन::
जब श्रीराधा ने चूड़ियों की मधुर पुकार सुनी, तब वे भी अपनी सखियों सहित वहाँ पहुँचीं।
श्रीकृष्ण ने जब राधाजी को देखा तो उनके नेत्र प्रेम से भर गए। वे मन ही मन उनकी अनुपम शोभा का दर्शन करने लगे।
राधाजी की शोभा::
नवगौराङ्गीं नवयौवनाढ्यां
स्मेराननाम् चारुविलासयुक्ताम्।
वृन्दावनेशस्य मनोहरां तां
राधां भजे प्रेमरसस्वरूपाम्॥
भावार्थ:
मैं नवयौवना, गौरवर्णा, मधुर मुस्कान वाली, प्रेमरस की मूर्ति श्रीराधा का भजन करता हूँ।
चूड़ी पहनाने का प्रसंग::
मणिहार बने कृष्ण बोले—
इन चूड़ियों को मैं स्वयं अपने हाथों से पहनाऊँगा।
राधाजी ने कहा—
"यदि तुम कुशल हो तो पहनाओ।"
जब श्रीकृष्ण चूड़ी पहनाने लगे, तब जानबूझकर चूड़ी छोटी चुन ली। चूड़ी हाथ में अटक गई।
सखियाँ हँसने लगीं—
अरे मणिहार! तुम तो चूड़ी पहनाना भी नहीं जानते!
श्रीकृष्ण बोले—
चूड़ी छोटी नहीं है, हाथ ही इतना कोमल और सुंदर है कि चूड़ी उसमें समाना नहीं चाहती।
यह सुनकर सब सखियाँ मुस्कुराने लगीं और राधाजी लज्जा से सिर झुका गईं।
रहस्य का उद्घाटन::
कुछ समय बाद ललिताजी और विशाखाजी को संदेह हो गया।
उन्होंने ध्यान से देखा—
वही श्याम वर्ण की झलक, वही चंचल मुस्कान, वही नेत्रों की मधुरता!
वे समझ गईं—
"यह कोई मणिहार नहीं, स्वयं नन्दनन्दन हैं।"
तब सखियों ने उन्हें घेर लिया और कहा—
हे मणिहार! अपना वास्तविक परिचय दो।
श्रीकृष्ण हँस पड़े और अपना भेष त्याग दिया।
सभी दिशाएँ आनन्द से भर उठीं।
इस लीला का रहस्य यह है कि भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने भक्तों के प्रेम के अधीन रहते हैं।
श्रीकृष्ण को न राज्य चाहिए, न वैभव, न स्वर्ग; उन्हें तो केवल राधाजी का प्रेम चाहिए।
इस भाव को भक्त कवियों ने इस प्रकार व्यक्त किया है—
नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥
भावार्थ:
हे नारद! मैं केवल वैकुण्ठ में ही नहीं रहता, न केवल योगियों के हृदय में; जहाँ मेरे भक्त प्रेमपूर्वक मेरा गुणगान करते हैं, वहीं निवास करता हूँ।
लीला का आध्यात्मिक संदेश::
1. भगवान प्रेम के भूखे हैं, बाहरी वैभव के नहीं।
2. श्रीराधा का प्रेम स्वयं भगवान को भी आकर्षित करता है।
3. भक्त और भगवान का संबंध औपचारिक नहीं, अपितु प्रेममय है।
4. कृष्ण की प्रत्येक लीला जीव को दिव्य प्रेम की ओर ले जाने वाली है।
तप्तकाञ्चनगौराङ्गी राधे वृन्दावनेश्वरी।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये॥
हे वृन्दावन की अधीश्वरी, वृषभानुनन्दिनी, श्रीहरि की परम प्रिया राधे! आपको बारम्बार प्रणाम है।
जय जय श्रीराधे!
जय श्रीश्यामसुन्दर!
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