👉जिन्देगी बहुत कठीन होती हैं । जब हम बच्चे होते हैं तो सारी दुनीया के गंम से दुर धर्म समाज से दुर सिर्फ मस्ती मे खेलते है नाचते हैं हर एक पल को खुशी से जिते हैं । मंगर जैसे जैसे हम बड़े होते हैं । ठिक उसी तरह जिन्देगी कठीन होने लगती हैं । जिबन मे संगघर्स बड़ने लगता हैं ।आगे जाने की होड़ सी लगजाती हैं । धिरे धिरे जिम्मेदारी को बोझ कंन्धे मे आने लगता हैं । तब ना दिन का ठिकाना रहता हैं और नही रात का । जिन्देगी का बोझ कंन्धे पर ढोते ढोते कब उम्र गुजर जाती हैं पता ही नही चलता । और एक दिन आत्मा शरीर को छोड़ देता हैं । शरीर आँग मे जल के राख हो जाती हैं । उस दिन हम मुक्त हो जाते सारी दनीया की दिबारे के पाढ़। जिन्देगी के सारे पिढ़ा से पार ,मोह माया से पार हो कर हमेशा के लिए मुक्त हो जाते हैं । तब ना कौई पिढ़ा होती हैं, ना ही कौई एहसास । एक शान्ती होती हैं, जिसका एहसास भी नही होता ।
🙏लेखक - शक्ति मंडल
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