Davinder Singh Rana
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3 days ago
*श्रीमद्भागवत महापुराण* *द्वीतीय स्कंध - अद्याय एक - ध्यान-विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन* *ॐ नमो भगवते वासुदेवाय* 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 श्रीशुकदेवजीने कहा — परीक्षित्! तुम्हारा लोकहित के लिये किया हुआ यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है⁠। मनुष्यों के लिये जितनी भी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करने की हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठ है⁠। आत्मज्ञानी महापुरुष ऐसे प्रश्न का बड़ा आदर करते हैं ⁠।⁠।⁠ 1 ।⁠। राजेन्द्र! जो गृहस्थ घर के काम-धंधों में उलझे हुए हैं, अपने स्वरूपको नहीं जानते, उनके लिये हजारों बातें कहने-सुनने एवं सोचने, करने की रहती हैं ⁠।⁠।⁠ 2 ।⁠। उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है⁠। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंग से कटती है और दिन धन की हाय-हाय या कुटुम्बियों के भरण-पोषण में समाप्त हो जाता है ⁠।⁠।⁠ 3 ।⁠। संसार में जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोह में ऐसा पागल-सा हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्यु का ग्रास होते देख कर भी चेतता नहीं ⁠।⁠।⁠ 4 ⁠।⁠। इसलिये परीक्षित्! जो अभय पद को प्राप्त करना चाहता है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये ⁠।⁠। 5 ⁠।⁠। मनुष्य-जन्म का यही — इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो — ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाय कि मृत्यु के समय भगवान्‌ की स्मृति अवश्य बनी रहे ⁠।⁠।⁠ 6 ⁠।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩 032 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩