*श्रीमद्भागवत महापुराण*
*द्वीतीय स्कंध - अद्याय एक - ध्यान-विधि और भगवान्के विराट्स्वरूपका वर्णन*
*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय*
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞
श्रीशुकदेवजीने कहा — परीक्षित्! तुम्हारा लोकहित के लिये किया हुआ यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है। मनुष्यों के लिये जितनी भी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करने की हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठ है। आत्मज्ञानी महापुरुष ऐसे प्रश्न का बड़ा आदर करते हैं ।। 1 ।। राजेन्द्र! जो गृहस्थ घर के काम-धंधों में उलझे हुए हैं, अपने स्वरूपको नहीं जानते, उनके लिये हजारों बातें कहने-सुनने एवं सोचने, करने की रहती हैं ।। 2 ।। उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंग से कटती है और दिन धन की हाय-हाय या कुटुम्बियों के भरण-पोषण में समाप्त हो जाता है ।। 3 ।। संसार में जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोह में ऐसा पागल-सा हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्यु का ग्रास होते देख कर भी चेतता नहीं ।। 4 ।। इसलिये परीक्षित्! जो अभय पद को प्राप्त करना चाहता है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये ।। 5 ।। मनुष्य-जन्म का यही — इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो — ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाय कि मृत्यु के समय भगवान् की स्मृति अवश्य बनी रहे ।। 6 ।।
शेष्ट अगली पोस्ट में ..
भागवत महापुराण
गीता प्रेस
राणा जी खेड़ांवाली 🚩 032 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩